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Rigveda Mandal 4 / Sukta 16 / Mantra 12

58 Sukta
21 Mantra
4/16/12
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
कुत्सा॑य॒ शुष्ण॑म॒शुषं॒ नि ब॑र्हीः प्रपि॒त्वे अह्नः॒ कुय॑वं स॒हस्रा॑। स॒द्यो दस्यू॒न्प्र मृ॑ण कु॒त्स्येन॒ प्र सूर॑श्च॒क्रं वृ॑हताद॒भीके॑ ॥१२॥

कुत्सा॑य । शुष्ण॑म् । अ॒शुष॑म् । नि । ब॒र्हीः॒ । प्र॒ऽपि॒त्वे । अह्नः॑ । कुय॑वम् । स॒हस्रा॑ । स॒द्यः । दस्यू॑न् । प्र । मृ॒ण॒ । कु॒त्स्येन॑ । प्र । सूरः॑ । च॒क्रम् । वृ॒ह॒ता॒त् । अ॒भीके॑ ॥

Mantra without Swara
कुत्साय शुष्णमशुषं नि बर्हीः प्रपित्वे अह्नः कुयवं सहस्रा। सद्यो दस्यून्प्र मृण कुत्स्येन प्र सूरश्चक्रं वृहतादभीके ॥

कुत्साय। शुष्णम्। अशुषम्। नि। बर्हीः। प्रऽपित्वे। अह्नः। कुयवम्। सहस्रा। सद्यः। दस्यून्। प्र। मृण। कुत्स्येन। प्र। सूरः। चक्रम्। वृहतात्। अभीके ॥१२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 19 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! आप (अह्नः) दिन के (प्रपित्वे) उत्तम प्रकार प्राप्त होने पर (कुत्साय) निन्दित व्यवहार के लिये (कुयवम्) निकृष्ट यव जिसके उस (शुष्णम्) रसरहित (अशुषम्) दुःख को (नि, बर्हीः) दूर करो और जैसे (सूरः) सूर्य्य (चक्रम्) चक्र के सदृश वर्त्तमान ब्रह्माण्ड को (कुत्सेन) वैसे वज्र में हुए वेग से (सहस्रा) सहस्रों (दस्यून्) दुष्ट चोरों को (सद्यः) शीघ्र (प्र) (मृण) नाश कीजिये (अभीके) समीप में (प्र, वृहतात्) छेदन कीजिये ॥१२॥
Essence
हे राजन् ! आप वज्र आदि शस्त्रों से दुष्ट चोरों का नाश करके सूर्य्य के सदृश प्रतापी हूजिये ॥१२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥