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Rigveda Mandal 4 / Sukta 16 / Mantra 11

58 Sukta
21 Mantra
4/16/11
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यासि॒ कुत्से॑न स॒रथ॑मव॒स्युस्तो॒दो वात॑स्य॒ हर्यो॒रीशा॑नः। ऋ॒ज्रा वाजं॒ न गध्यं॒ युयू॑षन्क॒विर्यदह॒न्पार्या॑य॒ भूषा॑त् ॥११॥

यासि॑ । कुत्से॑न । स॒ऽरथ॑म् । अ॒व॒स्युः । तो॒दः । वात॑स्य । हर्योः॑ । ईशा॑नः । ऋ॒ज्रा । वाज॑म् । न । गध्य॑म् । युयू॑षन् । क॒विः । यत् । अह॑न् । पार्या॑य । भूषा॑त् ॥

Mantra without Swara
यासि कुत्सेन सरथमवस्युस्तोदो वातस्य हर्योरीशानः। ऋज्रा वाजं न गध्यं युयूषन्कविर्यदहन्पार्याय भूषात् ॥

यासि। कुत्सेन। सऽरथम्। अवस्युः। तोदः। वातस्य। हर्योः। ईशानः। ऋज्रा। वाजम्। न। गध्यम्। युयूषन्। कविः। यत्। अहन्। पार्याय। भूषात् ॥११॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 19 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! जिससे आप (अवस्युः) अपनी रक्षा की इच्छा करते हुए (तोदः) शत्रुओं के नाशकर्त्ता (वातस्य) पवन और (हर्य्योः) घोड़ों के (ईशानः) स्वामी होते हुए (सरथम्) रथ आदिकों के सहित सेना को (यासि) प्राप्त होते हो (ऋज्रा) और सरल गमनों को (गध्यम्) ग्रहण करने योग्य (वाजम्) वेग के (न) सदृश (युयूषन्) मिलाने की इच्छा करते हुए (कविः) श्रेष्ठ बुद्धियुक्त (कुत्सेन) निकृष्ट कर्म के सहित वर्त्तमान का (अहन्) नाश करता है (यत्) जो (पार्याय) पार होने के लिये (भूषात्) शोभित करे उसको प्राप्त होते हो, इससे राज्य करने को समर्थ हो सकते हो ॥११॥
Essence
जो लोग निन्दित कर्म्म और निन्दित जन के सङ्ग का त्याग करके सत्यन्याय से प्रजाओं का पालन करते हुए पुरुषार्थ करें, वे सब प्रकार से शोभित होवें ॥११॥
Subject
फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥