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Rigveda Mandal 4 / Sukta 16 / Mantra 10

58 Sukta
21 Mantra
4/16/10
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ द॑स्यु॒घ्ना मन॑सा या॒ह्यस्तं॒ भुव॑त्ते॒ कुत्सः॑ स॒ख्ये निका॑मः। स्वे योनौ॒ नि ष॑दतं॒ सरू॑पा॒ वि वां॑ चिकित्सदृत॒चिद्ध॒ नारी॑ ॥१०॥

आ । द॒स्यु॒ऽघ्ना । मन॑सा । या॒हि॒ । अस्त॑म् । भुव॑त् । ते॒ । कुत्सः॑ । स॒ख्ये । निऽका॑मः । स्वे । योनौ॑ । नि । स॒द॒त॒म् । सऽरू॑पा । वि । वा॒म् । चि॒कि॒त्स॒त् । ऋ॒त॒ऽचित् । ह॒ । नारी॑ ॥

Mantra without Swara
आ दस्युघ्ना मनसा याह्यस्तं भुवत्ते कुत्सः सख्ये निकामः। स्वे योनौ नि षदतं सरूपा वि वां चिकित्सदृतचिद्ध नारी ॥

आ। दस्युऽघ्ना। मनसा। याहि। अस्तम्। भुवत्। ते। कुत्सः। सख्ये। निऽकामः। स्वे। योनौ। नि। सदतम्। सऽरूपा। वि। वाम्। चिकित्सत्। ऋतऽचित्। ह। नारी ॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 18 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्य जो ! (मनसा) अन्तःकरण से (दस्युघ्ना) दुष्टस्वभाववालों को मारती (सरूपा) गुणादिकों से तुल्य रूपवती (ऋतचित्) सत्य को इकट्ठा करनेवाली (नारी) मनुष्य की स्त्री (भुवत्) हो उसको आप (आ) सब प्रकार (याहि) प्राप्त हूजिये और जो (ते) आपके (सख्ये) मित्र के लिये (कुत्सः) निन्दित (निकामः) निकृष्ट कामनायुक्त होवे उसको आप (अस्तम्) प्रक्षिप्त अर्थात् दूर करो और आपके (स्वे) अपने (योनौ) गृह में (वि, चिकित्सत्) विशेष चिकित्सा करता है, वह दोनों (ह) निश्चय से (वाम्) आप दोनों के गृह में (नि, सदतम्) रहें ॥१०॥
Essence
हे पुरुष ! आप निन्दित स्त्री का त्याग करके समान रूपवाली और दोषों के नाश करनेवाली को प्राप्त होओ और दोनों मिल कर प्रीति से अपने गृह में रहो ॥१०॥
Subject
अब राजविषयसम्बन्धिप्रजाविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥