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Rigveda Mandal 4 / Sukta 15 / Mantra 6

58 Sukta
10 Mantra
4/15/6
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तमर्व॑न्तं॒ न सा॑न॒सिम॑रु॒षं न दि॒वः शिशु॑म्। म॒र्मृ॒ज्यन्ते॑ दि॒वेदि॑वे ॥६॥

तम् । अर्व॑न्तम् । न । सा॒न॒सिम् । अ॒रु॒षम् । न । दि॒वः । शिशु॑म् । म॒र्मृ॒ज्यन्ते॑ । दि॒वेऽदि॑वे ॥

Mantra without Swara
तमर्वन्तं न सानसिमरुषं न दिवः शिशुम्। मर्मृज्यन्ते दिवेदिवे ॥

तम्। अर्वन्तम्। न। सानसिम्। अरुषम्। न। दिवः। शिशुम्। मर्मृज्यन्ते। दिवेऽदिवे ॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 16 Mantra » 1

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Meaning
हे अग्ने राजन् ! जिस (दिवः) प्रकाश से (शिशुम्) पुत्र को (अर्वन्तम्) शीघ्र चलनेवाले घोड़े के (न) सदृश वा (अरुषम्) रक्तगुणों से विशिष्ट के (न) सदृश (सानसिम्) और विभाग करने योग्य पदार्थ को (दिवेदिवे) प्रतिदिन विद्वान् लोग (मर्मृज्यन्ते) शुद्ध करते हैं (तम्) उसको आप पवित्र करो ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो मनुष्य घोड़े के सदृश सन्तानों को शिक्षा देते हैं, वे नित्य सुख को बढ़ाते हैं ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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