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Rigveda Mandal 4 / Sukta 15 / Mantra 2

58 Sukta
10 Mantra
4/15/2
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
परि॑ त्रिवि॒ष्ट्य॑ध्व॒रं यात्य॒ग्नी र॒थीरि॑व। आ दे॒वेषु॒ प्रयो॒ दध॑त् ॥२॥

परि॑ । त्रि॒ऽवि॒ष्टि । अ॒ध्व॒रम् । याति॑ । अ॒ग्निः । र॒थीःऽइ॑व । आ । दे॒वेषु । प्रयः॑ । दध॑त् ॥

Mantra without Swara
परि त्रिविष्ट्यध्वरं यात्यग्नी रथीरिव। आ देवेषु प्रयो दधत् ॥

परि। त्रिऽविष्टि। अध्वरम्। याति। अग्निः। रथीःऽइव। आ। देवेषु। प्रयः। दधत् ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 15 Mantra » 2

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Meaning
हे विद्वानो ! जो (अग्निः) अग्नि (रथीरिव) श्रेष्ठ रथ आदि से युक्त सेना के स्वामी के सदृश (देवेषु) प्रकाशमान विद्वानों में (प्रयः) कामना करने योग्य धन को (दधत्) धारण करता हुआ (त्रिविष्टि) तीन प्रकार के सुख के प्रवेश में (अध्वरम्) सत्कार करने योग्य व्यवहार को (परि, आ, याति) सब ओर से प्राप्त होता है, वह आप लोगों से कार्य्यों में युक्त करने योग्य है ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे उत्तम सेना से युक्त सेनाध्यक्ष पुरुष तीन प्रकार के सुख को प्राप्त होता है, वैसे ही अग्निविद्या का जाननेवाला शरीर, आत्मा और इन्द्रियों के आनन्द को प्राप्त होता है ॥२॥
Subject
फिर अग्निविद्याविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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