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Rigveda Mandal 4 / Sukta 15 / Mantra 10

58 Sukta
10 Mantra
4/15/10
Devata- अश्विनौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तं यु॒वं दे॑वावश्विना कुमा॒रं सा॑हदे॒व्यम्। दी॒र्घायु॑षं कृणोतन ॥१०॥

तम् । यु॒वम् । दे॒वौ॒ । अ॒श्वि॒ना॒ । कु॒मा॒रम् । सा॒ह॒ऽदे॒व्यम् । दी॒र्घऽआ॑युषम् । कृ॒णो॒त॒न॒ ॥

Mantra without Swara
तं युवं देवावश्विना कुमारं साहदेव्यम्। दीर्घायुषं कृणोतन ॥

तम्। युवम्। देवौ। अश्विना। कुमारम्। साहऽदेव्यम्। दीर्घऽआयुषम्। कृणोतन ॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 16 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (देवौ) विद्या के देनेवाले (अश्विना) श्रेष्ठ गुणों में व्यापक (युवम्) आप दोनों (तम्) उस पढ़नेवाले (साहदेव्यम्) विद्वानों के उत्तम साथी (कुमारम्) ब्रह्मचारी को (दीर्घायुषम्) अधिक अवस्थावाला (कृणोतन) करो ॥१०॥
Essence
हे विद्वानो और विदुषियो ! आप लोग पढ़ाने के लिये प्रवृत्त हो और उत्तम शिक्षा करके और विद्या के योग को सम्पादन करके सब श्रेष्ठ पुरुषों को बहुत कालपर्य्यन्त जीवनेवाले करो ॥१०॥ इस सूक्त में अग्नि, राजा अध्यापक और पढ़नेवाले के कर्मों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥१०॥ यह पन्द्रहवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥