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Rigveda Mandal 4 / Sukta 14 / Mantra 4

58 Sukta
5 Mantra
4/14/4
Devata- अग्निर्लिङ्गोक्ता वा Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ वां॒ वहि॑ष्ठा इ॒ह ते व॑हन्तु॒ रथा॒ अश्वा॑स उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ। इ॒मे हि वां॑ मधु॒पेया॑य॒ सोमा॑ अ॒स्मिन्य॒ज्ञे वृ॑षणा मादयेथाम् ॥४॥

आ । वा॒म् । वहि॑ष्ठाः । इ॒ह । ते । व॒ह॒न्तु॒ । रथाः॑ । अश्वा॑सः । उ॒षसः॑ । विऽउ॑ष्टौ । इ॒मे । हि । वा॒म् । म॒धु॒ऽपेया॑य । सोमाः॑ । अ॒स्मिन् । य॒ज्ञे । वृ॒ष॒णा॒ । मा॒द॒ये॒था॒म् ॥

Mantra without Swara
आ वां वहिष्ठा इह ते वहन्तु रथा अश्वास उषसो व्युष्टौ। इमे हि वां मधुपेयाय सोमा अस्मिन्यज्ञे वृषणा मादयेथाम् ॥

आ। वाम्। वहिष्ठाः। इह। ते। वहन्तु। रथाः। अश्वासः। उषसः। विऽउष्टौ। इमे। हि। वाम्। मधुऽपेयाय। सोमाः। अस्मिन्। यज्ञे। वृषणा। मादयेथाम् ॥४॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 14 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे स्त्री-पुरुषो ! (वाम्) आप दोनों जो लोग (वहिष्ठाः) अत्यन्त धारण करनेवाले (रथाः) वाहन (अश्वासः) शीघ्र चलनेवाले (उषसः) प्रातःकाल के (व्युष्टौ) विशिष्ट प्रताप में हैं (ते) वे आप दोनों को (इह) इस संसार में (आ, वहन्तु) अभीष्ट स्थान को पहुँचावें और जो (इमे) ये (हि) जिस कारण (वाम्) आप दोनों के (सोमाः) ऐश्वर्य के सहित पदार्थ (अस्मिन्) इस (यज्ञे) मेल करने योग्य गृहाश्रम में (मधुपेयाय) मधुर गुणों से पीने योग्य के लिये होते हैं, इस कारण उनका इस संसार में सेवन करके (वृषणा) पराक्रमवाले होते हुए आप दोनों (मादयेथाम्) आनन्दित होवें ॥४॥
Essence
हे स्त्री पुरुषो ! आप लोग यदि रात्रि के चौथे प्रहर में उठ और आवश्यक कृत्य करके वाहन वा पैरों से सूर्योदय से पहिले शुद्ध वायु देश में भ्रमण करें तो आप लोगों को रोग कभी न प्राप्त होवें, जिससे कि बलिष्ठ और अधिक अवस्थावाले हुए इस गृहाश्रम में बड़े आनन्द को भोगो ॥४॥
Subject
अब स्त्री-पुरुष के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥