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Rigveda Mandal 4 / Sukta 14 / Mantra 1

58 Sukta
5 Mantra
4/14/1
Devata- अग्निर्लिङ्गोक्ता वा Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्रत्य॒ग्निरु॒षसो॑ जा॒तवे॑दा॒ अख्य॑द्दे॒वो रोच॑माना॒ महो॑भिः। आ ना॑सत्योरुगा॒या रथे॑ने॒मं य॒ज्ञमुप॑ नो यात॒मच्छ॑ ॥१॥

प्रति॑ । अ॒ग्निः । उ॒षसः॑ । जा॒तऽवे॑दाः । अख्य॑त् । दे॒वः । रोच॑मानाः । महः॑ऽभिः । आ । ना॒स॒त्या॒ । उ॒रु॒ऽगा॒या । रथे॑न । इ॒मम् । य॒ज्ञम् । उप॑ । नः॒ । या॒त॒म् । अच्छ॑ ॥

Mantra without Swara
प्रत्यग्निरुषसो जातवेदा अख्यद्देवो रोचमाना महोभिः। आ नासत्योरुगाया रथेनेमं यज्ञमुप नो यातमच्छ ॥

प्रति। अग्निः। उषसः। जातऽवेदाः। अख्यत्। देवः। रोचमानाः। महःऽभिः। आ। नासत्या। उरुऽगाया। रथेन। इमम्। यज्ञम्। उप। नः। यातम्। अच्छ ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 14 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नासत्या) असत्य आचरण से रहित (उरुगाया) बहुत प्रशंसावाले अध्यापक और उपदेशक जनो ! आप दोनों (महोभिः) बड़ों के साथ (रथेन) वाहन से (नः) हम लोगों के प्रकाश्य और प्रकाशस्वरूप व्यवहार और (इमम्) इस वर्त्तमान (यज्ञम्) यज्ञ को (जातवेदाः) उत्पन्न हुए पदार्थों में विद्यमान (देवः) प्रकाशमान (अग्निः) बिजुली के सदृश अग्नि (रोचमानाः) प्रकाशमान (उषसः) दिन के मुख अर्थात् प्रारम्भ के (प्रति) प्रति (अख्यत्) प्रकाशित होता है, वैसे (अच्छ) उत्तम प्रकार (उप) समीप (आ, यातम्) आओ प्राप्त होओ ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो जैसे सूर्य्य प्रातःकाल से शोभित होता है, वैसे ही सत्य के उपदेश से रथ से मार्ग के सदृश विद्या के सुख को प्राप्त कराते हैं, वे इस संसार में कल्याणकारक होते हैं ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले चौदहवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्निसादृश्य से विद्वानों के गुणों का उपदेश करते हैं ॥