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Rigveda Mandal 4 / Sukta 12 / Mantra 5

58 Sukta
6 Mantra
4/12/5
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म॒हश्चि॑दग्न॒ एन॑सो अ॒भीक॑ ऊ॒र्वाद्दे॒वाना॑मु॒त मर्त्या॑नाम्। मा ते॒ सखा॑यः॒ सद॒मिद्रि॑षाम॒ यच्छा॑ तो॒काय॒ तन॑याय॒ शं योः ॥५॥

म॒हः । चि॒त् । अ॒ग्ने॒ । एन॑सः । अ॒भीके॑ । ऊ॒र्वात् । दे॒वाना॑म् । उ॒त । मर्त्या॑नाम् । मा । ते॒ । सखा॑यः । सद॑म् । इत् । रि॒षा॒म॒ । यच्छ॑ । तो॒काय॑ । तन॑याय । शम् । योः ॥

Mantra without Swara
महश्चिदग्न एनसो अभीक ऊर्वाद्देवानामुत मर्त्यानाम्। मा ते सखायः सदमिद्रिषाम यच्छा तोकाय तनयाय शं योः ॥

महः। चित्। अग्ने। एनसः। अभीके। ऊर्वात्। देवानाम्। उत। मर्त्यानाम्। मा। ते। सखायः। सदम्। इत्। रिषाम। यच्छ। तोकाय। तनयाय। शम्। योः ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 12 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! (देवानाम्) विद्वानों के (उत) और (मर्त्यानाम्) अविद्वानों के (अभीके) समीप में (महः) बड़े (चित्) भी (एनसः) अपराध के (ऊर्वात्) विस्तीर्णभाव से हम लोग विनाश करें अर्थात् उन कर्मों का नाश करें जो अपराध के मूल हैं और (ते) आपके (सखायः) मित्र हुए आपके (सदम्) स्थान को (मा) मत (रिषाम) नष्ट करें और आप (तोकाय) शीघ्र उत्पन्न हुए पाँच वर्ष की अवस्थावाले (तनयाय) पुत्र के लिये (शम्) सुख (योः) उत्तम कर्म से उत्पन्न हुआ (इत्) ही (यच्छ) दीजिये ॥५॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग विद्वानों के समीप स्थित हों और शिक्षा को प्राप्त होकर पापस्वरूप कर्म्म का त्याग कर अन्यों का भी त्याग करें =करावैं, सब के मित्र होकर कुमार और कुमारियों को उत्तम शिक्षा देकर और सम्पूर्ण विद्या प्राप्त करा के सुखयुक्त करें, वैसा आप लोग भी आचरण करो ॥५॥
Subject
फिर विद्वानों के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥