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Rigveda Mandal 4 / Sukta 12 / Mantra 2

58 Sukta
6 Mantra
4/12/2
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒ध्मं यस्ते॑ ज॒भर॑च्छश्रमा॒णो म॒हो अ॑ग्ने॒ अनी॑क॒मा स॑प॒र्यन्। स इ॑धा॒नः प्रति॑ दो॒षामु॒षासं॒ पुष्य॑न्र॒यिं स॑चते॒ घ्नन्न॒मित्रा॑न् ॥२॥

इ॒ध्मम् । यः । ते॒ । ज॒भर॑त् । श॒श्र॒मा॒णः । म॒हः । अ॒ग्ने॒ । अनी॑कम् । आ । स॒प॒र्यन् । सः । इ॒धा॒नः । प्रति॑ । दो॒षाम् । उ॒षस॑म् । पुष्य॑न् । र॒यिम् । स॒च॒ते॒ । घ्नन् । अ॒मित्रा॑न् ॥

Mantra without Swara
इध्मं यस्ते जभरच्छश्रमाणो महो अग्ने अनीकमा सपर्यन्। स इधानः प्रति दोषामुषासं पुष्यन्रयिं सचते घ्नन्नमित्रान् ॥

इध्मम्। यः। ते। जभरत्। शश्रमाणः। महः। अग्ने। अनीकम्। आ। सपर्यन्। सः। इधानः। प्रति। दोषाम्। उषसम्। पुष्यन्। रयिम्। सचते। घ्नन्। अमित्रान् ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 12 Mantra » 2

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Meaning
हे (अग्ने) राजन् ! (यः) जो (शश्रमाणः) अत्यन्त परिश्रम करता हुआ सेना का स्वामी (ते) आपकी (महः) बड़ी (इध्मम्) प्रकाशयुक्त (अनीकम्) विजय को प्राप्त होती हुई सेना की (आ) सब प्रकार (सपर्य्यन्) सेवा करता हुआ (जभरत्) यथावत् हरे पोषे पुष्ट हो अर्थात् शत्रु बल हरे और आप पुष्ट हो (सः) वह (इधानः) प्रकाशमान होता (प्रति, दोषाम्) प्रत्येक रात्रि और (उषासम्) प्रत्येक दिन (पुष्यन्) पुष्टि पाता (अमित्रान्) और धर्म से द्वेष करनेवाले शत्रुओं का (घ्नन्) नाश करता हुआ (रयिम्) राज्यलक्ष्मी को (सचते) प्राप्त होता है ॥२॥
Essence
हे राजन् ! जो आपके सेनाध्यक्ष और न्यायाधीश विद्या विनय और धर्म आदि से प्रकाशमान हुए अपनी प्रजाओं का पालन करते और दुष्ट शत्रुओं का नाश करते हुए विजय को प्राप्त होते हैं, उनके लिये आपको चाहिये कि बहुत प्रतिष्ठा और बहुत धन देकर दिन-रात्रि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की उन्नति करें ॥२॥
Subject
फिर अग्नि के सादृश्य से राजगुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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