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Rigveda Mandal 4 / Sukta 11 / Mantra 3

58 Sukta
6 Mantra
4/11/3
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराड्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
त्वद॑ग्ने॒ काव्या॒ त्वन्म॑नी॒षास्त्वदु॒क्था जा॑यन्ते॒ राध्या॑नि। त्वदे॑ति॒ द्रवि॑णं वी॒रपे॑शा इ॒त्थाधि॑ये दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य ॥३॥

त्वत् । अ॒ग्ने॒ । काव्या॑ । त्वम् । म॒नी॒षाः । त्वत् । उ॒क्था । जा॒य॒न्ते॒ । राध्या॑नि । त्वत् । ए॒ति॒ । द्रवि॑णम् । वी॒रऽपे॑शाः । इ॒त्थाऽधि॑ये । दा॒शुषे॑ । मर्त्या॑य ॥

Mantra without Swara
त्वदग्ने काव्या त्वन्मनीषास्त्वदुक्था जायन्ते राध्यानि। त्वदेति द्रविणं वीरपेशा इत्थाधिये दाशुषे मर्त्याय ॥

त्वत्। अग्ने। काव्या। त्वत्। मनीषाः। त्वत्। उक्था। जायन्ते। राध्यानि। त्वत्। एति। द्रविणम्। वीरऽपेशाः। इत्थाऽधिये। दाशुषे। मर्त्याय ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 11 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! आप (वीरपेशाः) वीर पुरुषों के रूप के सदृश रूपवाले हम लोग (इत्थाधिये) इस प्रकार (त्वत्) आपके समीप से बुद्धियुक्त (दाशुषे) देनेवाले (मर्त्याय) मनुष्य के लिये (काव्या) कवि विद्वानों के निर्मित किये काव्य (त्वत्) आपके समीप से (मनीषाः) यथार्थज्ञान (त्वत्) आपके समीप से (उक्था) प्रशंसा करने (राध्यानि) और सिद्ध करने योग्य द्रव्य (जायन्ते) प्रसिद्ध होते हैं (त्वत्) आपके समीप से (द्रविणम्) धन (एति) प्राप्त होता है, इससे हम लोग आपकी सेवा करें ॥३॥
Essence
हे राजन् ! जो आप विद्वान्, जितेन्द्रिय और न्यायकारी होवें तो आपके अनुकरण से सम्पूर्ण मनुष्य सत्य आचरण में प्रवृत्त हो और ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर सम्पूर्ण प्रजा का हित साध सकें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥