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Rigveda Mandal 4 / Sukta 11 / Mantra 1

58 Sukta
6 Mantra
4/11/1
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
भ॒द्रं ते॑ अग्ने सहसि॒न्ननी॑कमुपा॒क आ रो॑चते॒ सूर्य॑स्य। रुश॑द्दृ॒शे द॑दृशे नक्त॒या चि॒दरू॑क्षितं दृ॒श आ रू॒पे अन्न॑म् ॥१॥

भ॒द्रम् । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । स॒ह॒सि॒न् । अनी॑कम् । उ॒पा॒के । आ । रो॒च॒ते॒ । सूर्य॑स्य । रुश॑त् । दृ॒शे । द॒दृ॒शे॒ । न॒क्त॒ऽया । चि॒त् । अरू॑क्षितम् । दृ॒शे । आ । रू॒पे । अन्न॑म् ॥

Mantra without Swara
भद्रं ते अग्ने सहसिन्ननीकमुपाक आ रोचते सूर्यस्य। रुशद्दृशे ददृशे नक्तया चिदरूक्षितं दृश आ रूपे अन्नम् ॥

भद्रम्। ते। अग्ने। सहसिन्। अनीकम्। उपाके। आ। रोचते। सूर्यस्य। रुशत्। दृशे। ददृशे। नक्तऽया। चित्। अरूक्षितम्। दृशे। आ। रूपे। अन्नम् ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 11 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सहसिन्) बहुत बल से युक्त (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान ! जिन (ते) आपके (उपाके) समीप में (भद्रम्) कल्याणकारक (रुशत्) उत्तम स्वरूपयुक्त (अनीकम्) सेना (सूर्यस्य) सूर्य के किरणों के सदृश (आ, रोचते) प्रकाशित होती है और (नक्तया) रात्रि के सहित चन्द्रमा के सदृश (ददृशे) दीखती (चित्) और सुख (दृशे) देखने के (अरूक्षितम्) रुखेपन से रहित (अन्नम्) भोजन करने योग्य पदार्थ (दृशे) देखने के योग्य (रूपे) रूप में (आ) प्रकाशित होता है, उन आप का सर्वत्र विजय हो, यह निश्चय है ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा उत्तम प्रकार शिक्षित सेना तथा उत्तम गुणों और ऐश्वर्य के सहित प्रजाओं का पालन करता और दुष्टों को पीड़ा देता है, वह चन्द्र और सूर्य के सदृश सर्वत्र प्रकाशित होता है ॥१॥
Subject
अब अग्नि की सदृशता से राजगुणों को कहते हैं ॥