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Rigveda Mandal 4 / Sukta 10 / Mantra 8

58 Sukta
8 Mantra
4/10/8
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
शि॒वा नः॑ स॒ख्या सन्तु॑ भ्रा॒त्राग्ने॑ दे॒वेषु॑ यु॒ष्मे। सा नो॒ नाभिः॒ सद॑ने॒ सस्मि॒न्नूध॑न् ॥८॥

शि॒वा । नः॒ । स॒ख्या । सन्तु॑ । भ्रा॒त्रा । अग्ने॑ । दे॒वेषु॑ । यु॒ष्मे इति॑ । सा । नः॒ । नाभिः॑ । सद॑ने । सस्मि॑न् । ऊध॑म् ॥

Mantra without Swara
शिवा नः सख्या सन्तु भ्रात्राग्ने देवेषु युष्मे। सा नो नाभिः सदने सस्मिन्नूधन् ॥

शिवा। नः। सख्या। सन्तु। भ्रात्रा। अग्ने। देवेषु। युष्मे इति। सा। नः। नाभिः। सदने। सस्मिन्। ऊधन्॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 10 Mantra » 8

Bhashya

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश पवित्र आचरणयुक्त जो आपके (नाभिः) मध्य अङ्ग के सदृश (शिवा) मङ्गलकारिणी नीति (सस्मिन्) समस्त (ऊधन्) श्रेष्ठ धनाढ्य में और (सदने) विराजें जिसमें उस राज्य में वर्त्तमान है (सा) वह (नः) हम लोगों के (देवेषु) विद्वानों वा उत्तम गुणों में (युष्मे) आप लोगों को प्रवृत्त करे। जो लोग (सख्या) मित्र और (भ्रात्रा) बन्धु के सदृश वर्त्तमान पुरुष के साथ वर्त्तमानों के तुल्य (नः) हम लोगों की रक्षा करनेवाले (सन्तु) हों, उनमें आप विश्वास करो ॥८॥
Essence
जो राजपुरुष परस्पर मित्रता करके प्रजाओं में पिता के सदृश वर्त्तमान हैं, उन लोगों के साथ जो राजनीति का प्रचार करता है, वही सर्वदा राज्य भोगने के योग्य है ॥८॥ इस सूक्त में अग्नि, राजा, मन्त्री और प्रजा के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥८॥ यह चतुर्थ मण्डल में दशवाँ सूक्त प्रथम अनुवाक तृतीय अष्टक के पाँचवें अध्याय में दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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