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Rigveda Mandal 4 / Sukta 10 / Mantra 7

58 Sukta
8 Mantra
4/10/7
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिग्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
कृ॒तं चि॒द्धि ष्मा॒ सने॑मि॒ द्वेषोऽग्न॑ इ॒नोषि॒ मर्ता॑त्। इ॒त्था यज॑मानादृतावः ॥७॥

कृ॒तम् । चि॒त् । हि । स्म॒ । सने॑मि । द्वेषः॑ । अग्ने॑ । इ॒नोषि॑ । मर्ता॑त् । इ॒त्था । यज॑मानात् । ऋ॒त॒ऽवः॒ ॥

Mantra without Swara
कृतं चिद्धि ष्मा सनेमि द्वेषोऽग्न इनोषि मर्तात्। इत्था यजमानादृतावः ॥

कृतम्। चित्। हि। स्म। सनेमि। द्वेषः। अग्ने। इनोषि। मर्तात्। इत्था। यजमानात्। ऋतऽवः॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 10 Mantra » 7

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Meaning
हे (ऋतावः) सत्य से युक्त (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान ! जो आप (हि) ही (चित्) निश्चित (द्वेषः) द्वेष करनेवाले (मर्त्तात्) मनुष्य से वा (इत्था) इस प्रकार (यजमानात्) धर्म से सङ्ग किये हुए जन से (सनेमि) अनादि सिद्ध और (कृतम्) उत्पन्न किये गये को (इनोषि) विशेषता से प्राप्त होते हैं (स्म) वही राज्य करने योग्य हैं ॥७॥
Essence
हे राजा आदि मनुष्यो ! आप लोग शत्रु और मित्रों से उत्तम गुणों को ग्रहण करके सुखों को प्राप्त होइये ॥७॥
Subject
फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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