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Rigveda Mandal 4 / Sukta 10 / Mantra 6

58 Sukta
8 Mantra
4/10/6
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
घृ॒तं न पू॒तं त॒नूर॑रे॒पाः शुचि॒ हिर॑ण्यम्। तत्ते॑ रु॒क्मो न रो॑चत स्वधावः ॥६॥

घृ॒तम् । न । पू॒तम् । त॒नूः । अ॒रे॒पाः । शुचि॑ । हिर॑ण्यम् । तत् । ते॒ । रु॒क्मः । न । रो॒च॒त॒ । स्व॒धा॒ऽवः॒ ॥

Mantra without Swara
घृतं न पूतं तनूररेपाः शुचि हिरण्यम्। तत्ते रुक्मो न रोचत स्वधावः ॥

घृतम्। न। पूतम्। तनूः। अरेपाः। शुचि। हिरण्यम्। तत्। ते। रुक्मः। न। रोचत। स्वधाऽवः॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 10 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (स्वधावः) बहुत अन्न से युक्त राजन् ! जो (अरेपाः) पाप के आचरण से रहित (ते) आपके राज्य में (रुक्मः) अत्यन्त दिपते हुए के (न) सदृश (रोचत) शोभित होते हैं और जो (शुचि) पवित्र (हिरण्यम्) ज्योति के सदृश सुवर्ण को प्राप्त कराते हैं (तत्) उसको प्राप्त होकर उनके साथ आपका (तनूः) देह (पूतम्) पवित्र (घृतम्) घृत वा जल के (न) सदृश और चिरञ्जीव हो ॥६॥
Essence
हे राजन् ! जो सूर्य्य के सदृश तेजस्वी, धनयुक्त, कुलीन, पवित्र, प्रशंसित, अपराधरहित, श्रेष्ठ शरीरयुक्त, विद्या और अवस्था में वृद्ध होवें, वे आपके और आपके राज्य के रक्षक हों और आप इन लोगों की सम्मति से वर्त्तमान होकर अधिक अवस्थायुक्त हूजिये ॥६॥
Subject
फिर प्रजाविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥