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Rigveda Mandal 4 / Sukta 10 / Mantra 5

58 Sukta
8 Mantra
4/10/5
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
तव॒ स्वादि॒ष्ठाग्ने॒ संदृ॑ष्टिरि॒दा चि॒दह्न॑ इ॒दा चि॑द॒क्तोः। श्रि॒ये रु॒क्मो न रो॑चत उपा॒के ॥५॥

तव॑ । स्वादि॑ष्ठा । अग्ने॑ । सम्ऽदृ॑ष्टिः । इ॒दा । चि॒त् । अह्नः॑ । इ॒दा । चि॒त् । अ॒क्तोः । श्रि॒ये । रु॒क्मः । न । रो॒च॒ते॒ । उ॒पा॒के ॥

Mantra without Swara
तव स्वादिष्ठाग्ने संदृष्टिरिदा चिदह्न इदा चिदक्तोः। श्रिये रुक्मो न रोचत उपाके ॥

तव। स्वादिष्ठा। अग्ने। सम्ऽदृष्टिः। इदा। चित्। अह्नः। इदा। चित्। अक्तोः। श्रिये। रुक्मः। न। रोचते। उपाके॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 10 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) सूर्य के सदृश प्रकाशमान राजन् ! जो (स्वादिष्ठा) अत्यन्त स्वादुयुक्त मधुर (संदृष्टिः) अच्छी दृष्टि (तव) आपके (उपाके) समीप में (अह्नः) दिन (चित्) और (अक्तोः) रात्रि के मध्य में (रुक्मः) प्रकाशमान सूर्य्य के (न) सदृश (श्रिये) लक्ष्मी की प्राप्ति के लिये (रोचते) प्रकाशित होती है (इदा) वही आपको रक्षा करने योग्य है (चित्) और जो सम्पूर्ण गुणों से युक्त पुरुष राज्य की रक्षा कर सके और शत्रु को रोक सके (इदा) वही आपको गुरु के सदृश सेवा करने योग्य है ॥५॥
Essence
हे राजन् ! जो दिन रात्रि के प्रबन्ध देखने अन्याय का विरोध करने और न्याय की प्रवृत्ति करनेवाला दूत वा मन्त्री होवे, वही पहिले सत्कार करके रक्षा करने योग्य है ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥