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Rigveda Mandal 4 / Sukta 1 / Mantra 9

58 Sukta
20 Mantra
4/1/9
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स चे॑तय॒न्मनु॑षो य॒ज्ञब॑न्धुः॒ प्र तं म॒ह्या र॑श॒नया॑ नयन्ति। स क्षे॑त्यस्य॒ दुर्या॑सु॒ साध॑न्दे॒वो मर्त॑स्य सधनि॒त्वमा॑प ॥९॥

सः । चे॒त॒य॒त् । मनु॑षः । य॒ज्ञऽब॑न्धुः । प्र । तम् । म॒ह्या । र॒श॒नया॑ । न॒य॒न्ति॒ । सः । क्षे॒ति॒ । अ॒स्य॒ । दुर्या॑सु । साध॑न् । दे॒वः । मर्त॑स्य । स॒ध॒नि॒ऽत्वम् । आ॒प॒ ॥

Mantra without Swara
स चेतयन्मनुषो यज्ञबन्धुः प्र तं मह्या रशनया नयन्ति। स क्षेत्यस्य दुर्यासु साधन्देवो मर्तस्य सधनित्वमाप ॥

सः। चेतयत्। मनुषः। यज्ञऽबन्धुः। प्र। तम्। मह्या। रशनया। नयन्ति। सः। क्षेति। अस्य। दुर्यासु। साधन्। देवः। मर्तस्य। सधनिऽत्वम्। आप॥९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 13 Mantra » 4

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Meaning
जो (सः) वह (यज्ञबन्धुः) न्याय व्यवहार के भ्राता के सदृश वर्त्तमान राजा (मनुषः) मन्त्री और प्रजाजनों को (चेतयत्) जनावे (तम्) उसको जो सभासद् लोग (मह्या) बड़ी (रशनया) रस्सी से घोड़े के सदृश नीति से (प्र) (नयन्ति) अच्छे प्रकार प्राप्त करते हैं (सः) वह (अस्य) इस राज्य के (दुर्य्यासु) न्याय के स्थानों में राजव्यवहार को (साधन्) साधता हुआ (क्षेति) निवास करता है, वह (देवः) देनेवाला (मर्त्तस्य) मनुष्यसम्बन्धी (सधनित्वम्) धनीपन के साथ वर्त्तमान राज्य को (आप) प्राप्त होता है ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यथार्थवादी अध्यापक और उपदेशक लोग उत्तम शिक्षा से विद्यार्थियों के लिये धर्मयुक्त मर्य्यादा को प्राप्त कराते हैं, वैसे ही राजनीति की शिक्षा से राजा के लिये राजधर्म के मार्ग को प्राप्त करो। और जो मन्त्री और प्रजा के सहित राजा व्यसनरहित होकर प्रीति से राजधर्म को करता है, वह ऐश्वर्य्ययुक्त जन और राज्य को प्राप्त होकर सुख से निवास करता है ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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