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Rigveda Mandal 4 / Sukta 1 / Mantra 8

58 Sukta
20 Mantra
4/1/8
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स दू॒तो विश्वेद॒भि व॑ष्टि॒ सद्मा॒ होता॒ हिर॑ण्यरथो॒ रंसु॑जिह्वः। रो॒हिद॑श्वो वपु॒ष्यो॑ वि॒भावा॒ सदा॑ र॒ण्वः पि॑तु॒मती॑व सं॒सत् ॥८॥

सः । दू॒तः । विश्वा॑ । इत् । अ॒भि । व॒ष्टि॒ । सद्म॑ । होता॑ । हिर॑ण्यऽरथः । रम्ऽसु॑जिह्वः । रो॒हित्ऽअ॑श्वः । व॒पु॒ष्यः॑ । वि॒भाऽवा॑ । सदा॑ । र॒ण्वः । पि॒तु॒मती॑ऽइव । सं॒सत् ॥

Mantra without Swara
स दूतो विश्वेदभि वष्टि सद्मा होता हिरण्यरथो रंसुजिह्वः। रोहिदश्वो वपुष्यो विभावा सदा रण्वः पितुमतीव संसत् ॥

सः। दूतः। विश्वा। इत्। अभि। वष्टि। सद्म। होता। हिरण्यऽरथः। रम्ऽसुजिह्वः। रोहित्ऽअश्वः। वपुष्यः। विभाऽवा। सदा। रण्वः। पितुमतीऽइव। सम्ऽसत्॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 13 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(हिरण्यरथः) तेजोमय सुन्दर स्वरूपयुक्त सूर्य्य के सदृश जिसका व्यवहार (रंसुजिह्वः) सुन्दर जिसकी वाणी (रोहिदश्वः) जिसके रक्त आदि गुणों से विशिष्ट अग्नि आदिक घोड़े शीघ्र चलनेवाले वह (वपुष्यः) रूपों में प्रसिद्ध (विभावा) ऐश्वर्य्यवान् (रण्वः) सुन्दर स्वरूपयुक्त (होता) देने वा लेनेवाला होता हुआ राजा (दूतः) दुष्टों को सन्ताप देते हुए के सदृश (विश्वा) सब (सद्म) उत्तम कर्म वा स्थानों की (अभि, वष्टि) कामना करता है (सः) वह (इत्) ही (संसत्) चक्रवर्तियों की सभा (पितुमतीव) जो कि प्रशंसित बहुत अन्न आदि ऐश्वर्य्य से युक्त उसके सदृश (सदा) सब काल में उन्नतिशील होता है ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार हैं। जैसे दूतजन राजाओं के हित करने की इच्छा करते हैं, वैसे ही जो राजाजन प्रजा का हित निरन्तर करते हैं, वे राजा और सभासद् पुण्य के भजनेवाले होते हैं ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥