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Rigveda Mandal 4 / Sukta 1 / Mantra 7

58 Sukta
20 Mantra
4/1/7
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्रिर॑स्य॒ ता प॑र॒मा स॑न्ति स॒त्या स्पा॒र्हा दे॒वस्य॒ जनि॑मान्य॒ग्नेः। अ॒न॒न्ते अ॒न्तः परि॑वीत॒ आगा॒च्छुचिः॑ शु॒क्रो अ॒र्यो रोरु॑चानः ॥७॥

त्रिः । अ॒स्य॒ । ता । प॒र॒मा । स॒न्ति॒ । स॒त्या । स्पा॒र्हा । दे॒वस्य॑ । जनि॑मानि । अ॒ग्नेः । अ॒न॒न्ते । अ॒न्तरिति॑ । परि॑ऽवीतः । आ । अ॒गा॒त् । शुचिः॑ । शु॒क्रः । अ॒र्यः । रोरु॑चानः ॥

Mantra without Swara
त्रिरस्य ता परमा सन्ति सत्या स्पार्हा देवस्य जनिमान्यग्नेः। अनन्ते अन्तः परिवीत आगाच्छुचिः शुक्रो अर्यो रोरुचानः ॥

त्रिः। अस्य। ता। परमा। सन्ति। सत्या। स्पार्हा। देवस्य। जनिमानि। अग्नेः। अनन्ते। अन्तरिति। परिऽवीतः। आ। अगात्। शुचिः। शुक्रः। अर्यः। रोरुचानः॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 13 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (अग्नेः) अग्नि के सदृश जिस (अस्य, देवस्य) उत्तम गुण कर्म और स्वभाववाले इस राजा के जो (सत्या) उत्तम व्यवहारो में श्रेष्ठ (स्पार्हा) अभिकांक्षा करने के योग्य (परमा) उत्तम (जनिमानि) जन्म (सन्ति) हैं और जो (रोरुचानः) अत्यन्त प्रकाशमान (अर्य्यः) सब का स्वामी (शुक्रः) शीघ्र करनेवाला (शुचिः) पवित्र (परिवीतः) जिसके सब और उत्तम गुण, कर्म और स्वभाव व्याप्त वह (अनन्ते) परमात्मा वा आकाशविषयक (अन्तः) मध्य में (ता) उनको (त्रिः) तीन वार (आ, अगात्) प्राप्त होता है, वही सब का अधीश होने योग्य है ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वही उत्तम कुल उत्पन्न होता है कि जिसके उत्तम कर्म हों। और जैसे बिजुली आदि अग्नि सीमारहित अन्तरिक्ष में शोभित होता है, वैसे ही जो अनन्त जगदीश्वर का ध्यान करके सब ज्ञानवाला शुद्धियुक्त होकर सम्पूर्ण उत्तम प्रशंसा करने योग्य कर्मों के करने को समर्थ होता है ॥७॥
Subject
अब अग्नि के दृष्टान्त से विद्वानों के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥