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Rigveda Mandal 4 / Sukta 1 / Mantra 5

58 Sukta
20 Mantra
4/1/5
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स त्वं नो॑ अग्नेऽव॒मो भ॑वो॒ती नेदि॑ष्ठो अ॒स्या उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ। अव॑ यक्ष्व नो॒ वरु॑णं॒ ररा॑णो वी॒हि मृ॑ळी॒कं सु॒हवो॑ न एधि ॥५॥

सः । त्वम् । नः॒ । अ॒ग्ने॒ । अ॒व॒मः । भ॒व॒ । ऊ॒ती । नेदि॑ष्ठः । अ॒स्याः । उ॒षसः॑ । विऽउ॑ष्टौ । अव॑ । य॒क्ष्व॒ । नः॒ । वरु॑णम् । ररा॑णः । वी॒हि । मृ॒ळी॒कम् । सु॒ऽहवः॑ । नः॒ । ए॒धि॒ ॥

Mantra without Swara
स त्वं नो अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ। अव यक्ष्व नो वरुणं रराणो वीहि मृळीकं सुहवो न एधि ॥

सः। त्वम्। नः। अग्ने। अवमः। भव। ऊती। नेदिष्ठः। अस्याः। उषसः। विऽउष्टौ। अव। यक्ष्व। नः। वरुणम्। रराणः। वीहि। मृळीकम्। सुऽहवः। नः। एधि॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 12 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी विद्वन् पुरुष (सः) वह (त्वम्) आप (अस्याः) इस (उषसः) प्रातःकाल के (व्युष्टौ) विशेष दाह में (नेदिष्ठः) अत्यन्त समीप स्थित (ऊती) रक्षण आदि कर्म से (नः) हम लोगों के (अवमः) रक्षा करनेवाले (भव) हूजिये (वरुणम्) श्रेष्ठ अध्यापक वा उपदेशक को (रराणः) देते हुए (नः) हम लोगों को (अव, यक्ष्व) प्राप्त हूजिये और (सुहवः) उत्तम प्रकार बुलानेवाले हुए (नः) हम लोगों के लिये (मृळीकम्) सुख करनेवाले कार्य्य को (वीहि) व्याप्त हूजिये और हम लोगों को (एधि) प्राप्त हूजिये ॥५॥
Essence
वह ही अध्यापक वा राजा श्रेष्ठ है कि जो उत्तम शिक्षा से हम लोगों की प्रातःकाल के सदृश रक्षा करे। दुष्ट आचरण से अलग करके श्रेष्ठ आचरण करावे ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥