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Rigveda Mandal 4 / Sukta 1 / Mantra 3

58 Sukta
20 Mantra
4/1/3
Devata- अग्निर्वा वरुणश्च Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- अष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
सखे॒ सखा॑यम॒भ्या व॑वृत्स्वा॒शुं न च॒क्रं रथ्ये॑व॒ रंह्या॒स्मभ्यं॑ दस्म॒ रंह्या॑। अग्ने॑ मृळी॒कं वरु॑णे॒ सचा॑ विदो म॒रुत्सु॑ वि॒श्वभा॑नुषु। तो॒काय॑ तु॒जे शु॑शुचान॒ शं कृ॑ध्य॒स्मभ्यं॑ दस्म॒ शं कृ॑धि ॥३॥

सखे॑ । सखा॑यम् । अ॒भि । आ । व॒वृ॒त्स्व॒ । आ॒शुम् । न । च॒क्रम् । रथ्या॑ऽइव । रंह्या॑ । अ॒स्मभ्य॑म् । द॒स्म॒ । रंह्या॑ । अग्ने॑ । मृ॒ळी॒कम् । वरु॑णे । सचा॑ । वि॒दः॒ । म॒रुत्ऽसु॑ । वि॒श्वऽभा॑नुषु । तो॒काय॑ । तु॒जे । शु॒शु॒चा॒न॒ । शम् । कृ॒धि॒ । अ॒स्मभ्य॑म् । द॒स्म॒ । शम् । कृ॒धि॒ ॥

Mantra without Swara
सखे सखायमभ्या ववृत्स्वाशुं न चक्रं रथ्येव रंह्यास्मभ्यं दस्म रंह्या। अग्ने मृळीकं वरुणे सचा विदो मरुत्सु विश्वभानुषु। तोकाय तुजे शुशुचान शं कृध्यस्मभ्यं दस्म शं कृधि ॥

सखे। सखायम्। अभि। आ। ववृत्स्व। आशुम्। न। चक्रम्। रथ्याऽइव। रंह्या। अस्मभ्यम्। दस्म। रंह्या। अग्ने। मृळीकम्। वरुणे। सचा। विदः। मरुत्ऽसु। विश्वऽभानुषु। तोकाय। तुजे। शुशुचान। शम्। कृधि। अस्मभ्यम्। दस्म। शम्। कृधि॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 12 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सखे) मित्र ! (चक्रम्) पहिये के और (आशुम्) शीघ्र चलनेवाले घोड़े के (न) सदृश (सखायम्) स्नेही जन को (अभि, आ, ववृत्स्व) समीप वर्त्ताइये और (दस्म) हे दुःख के नाशकर्त्ता ! (रंह्या) प्राप्त होने योग्य (रथ्येव) वाहनों के निमित्त उत्तम स्थानों को जैसे, वैसे (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (रंह्या) प्राप्त होने योग्यों के सब प्रकार समीप प्राप्त होइये और (अग्ने) हे अग्नि के सदृश प्रकाशमान ! आप (सचा) सत्य के संयोग से (वरुणे) उपदेश देनेवाले के विषय में (मृळीकम्) सुखकर्त्ता को (विदः) प्राप्त होवें और (शुशुचान) हे पवित्र करनेवाले ! (विश्वभानुषु) सब में सूर्य के सदृश प्रकाश करनेवाले (मरुत्सु) मनुष्यों में (तुजे) विद्या और बल की इच्छा करनेवाले (तोकाय) पुत्रादि के लिये (शम्) सुख को (कृधि) करो और (दस्म) हे अविद्या के नाश करनेवाले ! आप (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (शम्) सुख (कृधि) करिये ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! आप लोग सब लोगों के साथ मित्र होकर जैसे घोड़े रथ को ले चलते हैं, वैसे मित्रों को उत्तम कर्म्मों में प्रवृत्त करो और श्रेष्ठमार्ग के सदृश हम लोगों को सरल मर्य्यादा में पहुँचाइये। जो लोग इस संसार में सूर्य्य के सदृश उत्तम गुणों से युक्त हुए सब के आत्माओं को प्रकाशित करके सुख को उत्पन्न करें, वे हम लोगों से सत्कार करने योग्य होवें ॥३॥
Subject
फिर उस ही विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥