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Rigveda Mandal 4 / Sukta 1 / Mantra 20

58 Sukta
20 Mantra
4/1/20
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
विश्वे॑षा॒मदि॑तिर्य॒ज्ञिया॑नां॒ विश्वे॑षा॒मति॑थि॒र्मानु॑षाणाम्। अ॒ग्निर्दे॒वाना॒मव॑ आवृणा॒नः सु॑मृळी॒को भ॑वतु जा॒तवे॑दाः ॥२०॥

विश्वे॑षाम् । अदि॑तिः । य॒ज्ञियानाम् । विश्वे॑षाम् । अति॑थिः । मानु॑षाणाम् । अ॒ग्निः । दे॒वाना॑म् । अवः॑ । आ॒ऽवृ॒णा॒नः । सु॒ऽमृ॒ळी॒कः । भ॒व॒तु॒ । जा॒तऽवे॑दाः ॥

Mantra without Swara
विश्वेषामदितिर्यज्ञियानां विश्वेषामतिथिर्मानुषाणाम्। अग्निर्देवानामव आवृणानः सुमृळीको भवतु जातवेदाः ॥

विश्वेषाम्। अदितिः। यज्ञियानाम्। विश्वेषाम्। अतिथिः। मानुषाणाम्। अग्निः। देवानाम्। अवः। आऽवृणानः। सुऽमृळीकः। भवतु। जातऽवेदाः॥२०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 15 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! आप (विश्वेषाम्) सम्पूर्ण (यज्ञियानाम्) यज्ञों के अनुष्ठान करनेवालों के (अदितिः) अखण्डित अन्तरिक्ष के तुल्य (विश्वेषाम्) सम्पूर्ण (मानुषाणाम्) मनुष्यों में (अतिथिः) अभ्यागत के सदृश वर्त्तमान (देवानाम्) विद्वानों के (अग्निम्) अग्नि के सदृश (अवः) रक्षण को (आवृणानः) सब प्रकार स्वीकार करते हुए (जातवेदाः) उत्पन्न पदार्थों में विद्यमान हुए (सुमृळीकः) उत्तम प्रकार सुख करनेवाले (भवतु) हूजिये ॥२०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे यज्ञ के सुगन्धित धूम से शुद्ध हुआ अन्तरिक्ष पूर्णविद्यायुक्त, यथार्थवक्ता उपदेश देनेवाला पुरुष और सूर्य्य सुखदेनेवाले होते हैं, वैसे ही आप लोग सबों के लिये सुख देनेवाले हूजिये ॥२०॥ इस सूक्त में विद्वानों से जानने योग्य अग्नि वाणी सूर्य बिजुली आदिकों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥२०॥ यह प्रथम सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उक्त विषय को सूर्य के सम्बन्ध से भी कहते हैं ॥