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Rigveda Mandal 4 / Sukta 1 / Mantra 2

58 Sukta
20 Mantra
4/1/2
Devata- अग्निर्वा वरुणश्च Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- अतिजगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स भ्रात॑रं॒ वरु॑णमग्न॒ आ व॑वृत्स्व दे॒वाँ अच्छा॑ सुम॒तीय॒ज्ञव॑नसं॒ ज्येष्ठं॑ य॒ज्ञव॑नसम्। ऋ॒तावा॑नमादि॒त्यं च॑र्षणी॒धृतं॒ राजा॑नं चर्षणी॒धृत॑म् ॥२॥

सः । भ्रात॑रम् । वरु॑णम् । अ॒ग्ने॒ । आ । व॒वृ॒त्स्व॒ । दे॒वान् । अच्छ॑ । सु॒ऽम॒ती । य॒ज्ञऽव॑नसम् । ज्येष्ठ॑म् । य॒ज्ञऽव॑नसम् । ऋ॒तऽवा॑नम् । आ॒दि॒त्यम् । च॒र्ष॒णि॒ऽधृत॑म् । राजा॑नम् । च॒र्ष॒णि॒ऽधृत॑म् ॥

Mantra without Swara
स भ्रातरं वरुणमग्न आ ववृत्स्व देवाँ अच्छा सुमतीयज्ञवनसं ज्येष्ठं यज्ञवनसम्। ऋतावानमादित्यं चर्षणीधृतं राजानं चर्षणीधृतम् ॥

सः। भ्रातरम्। वरुणम्। अग्ने। आ। ववृत्स्व। देवान्। अच्छ। सुऽमती। यज्ञऽवनसम्। ज्येष्ठम्। यज्ञऽवनसम्। ऋतऽवानम्। आदित्यम्। चर्षणिऽधृतम्। राजानम्। चर्षणिऽधृतम्॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 12 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! (सः) वह आप (भ्रातरम्) प्रियबन्धु के सदृश (वरुणम्) श्रेष्ठजन को (सुमती) श्रेष्ठ बुद्धि से (यज्ञवनसम्) विद्याव्यवहार के विभाग करनेवाले (ज्येष्ठम्) विद्या से वृद्ध अध्यापक (यज्ञवनसम्) राज्यव्यवहार के विभाग करनेवाले (राजानम्) प्रकाशमान नरेश विद्याव्यवहार के विभाग करनेवाले (चर्षणीधृतम्) मनुष्यों के धारणकर्त्ता वा विद्वानों से धारण किये गए (आदित्यम्) सूर्य के सदृश वर्त्तमान (ऋतावानम्) सत्य के विभागकर्त्ता प्रकाशमान राजा (चर्षणीधृतम्) सत्यासत्य की विवेचना करनेवालों के धारण करनेवाले अध्यापक वा उपदेशक (देवान्) और धार्मिक विद्वानों को (अच्छ) अच्छे प्रकार (आ, ववृत्स्व) सब ओर से वर्त्तिये अर्थात् उनके अनुकूल वर्त्तमान कीजिये ॥२॥
Essence
हे अध्यापक वा राजन् ! आप श्रेष्ठ श्रोतृजन वा मन्त्रियों को उत्तम मति और सत्य आचरण से संयुक्त करके संगत कर्मों का सेवन कराओ और सूर्य्य के सदृश विद्या न्याय का प्रकाश निरन्तर करो ॥२॥
Subject
अब इस अगले मन्त्र में वाणी के विषय को कहते हैं ॥