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Rigveda Mandal 4 / Sukta 1 / Mantra 19

58 Sukta
20 Mantra
4/1/19
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अच्छा॑ वोचेय शुशुचा॒नम॒ग्निं होता॑रं वि॒श्वभ॑रसं॒ यजि॑ष्ठम्। शुच्यूधो॑ अतृण॒न्न गवा॒मन्धो॒ न पू॒तं परि॑षिक्तमं॒शोः ॥१९॥

अच्छ॑ । वो॒चे॒य॒ । शु॒शु॒चा॒नम् । अ॒ग्निम् । होता॑रम् । वि॒श्वऽभ॑रसम् । यजि॑ष्ठम् । शुचि॑ । ऊधः॑ । अ॒तृ॒ण॒त् । न । गवा॑म् । अन्धः॑ । न । पू॒तम् । परि॑ऽसिक्तम् । अं॒शोः ॥

Mantra without Swara
अच्छा वोचेय शुशुचानमग्निं होतारं विश्वभरसं यजिष्ठम्। शुच्यूधो अतृणन्न गवामन्धो न पूतं परिषिक्तमंशोः ॥

अच्छ। वोचेय। शुशुचानम्। अग्निम्। होतारम्। विश्वऽभरसम्। यजिष्ठम्। शुचि। ऊधः। अतृणत्। न। गवाम्। अन्धः। न। पूतम्। परिऽसिक्तम्। अंशोः॥१९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 15 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (अंशोः) प्राप्त सूर्य्य के (परिषिक्तम्) सब ओर से गीले किये हुए (पूतम्) पवित्र वस्तु (शुचि) और पवित्र कर्म को (अन्धः) अन्न के (न) तुल्य वा (गवाम्) गौओं के (ऊधः) प्रभात समय के सदृश (न) नहीं (अतृणत्) हिंसा करता है, उस (यजिष्ठम्) अत्यन्त मिलाने (विश्वभरसम्) संसार के धारण करने और (होतारम्) देने और (शुशुचानम्) शुद्ध गुण, कर्म और स्वभाव करानेवाले (अग्निम्) बिजुलीरूप अग्नि का आप लोगों के प्रति मैं (अच्छ) उत्तम प्रकार (वोचेय) उपदेश दूँ ॥१९॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे बिजुली समान रूप हुई सब की रक्षा करती है और विरूप होनेपर नाश करती, वह किरणों का नाश नहीं करती और अन्न के सदृश पालन करनेवाली होकर सब को चलाती है, ऐसा जानें ॥१९॥
Subject
अब बिजुली के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥