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Rigveda Mandal 4 / Sukta 1 / Mantra 14

58 Sukta
20 Mantra
4/1/14
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ते म॑र्मृजत ददृ॒वांसो॒ अद्रिं॒ तदे॑षाम॒न्ये अ॒भितो॒ वि वो॑चन्। प॒श्वय॑न्त्रासो अ॒भि का॒रम॑र्चन्वि॒दन्त॒ ज्योति॑श्चकृ॒पन्त॑ धी॒भिः ॥१४॥

ते । म॒र्मृ॒ज॒त॒ । द॒दृ॒ऽवांसः॑ । अद्रि॑म् । तत् । ए॒षा॒म् । अ॒न्ये । अ॒भितः॑ । वि । वो॒च॒न् । प॒श्वऽय॑न्त्रासः । अ॒भि । का॒रम् । अ॒र्च॒न् । वि॒दन्त॑ । ज्योतिः॑ । च॒कृ॒पन्त॑ । धी॒भिः ॥

Mantra without Swara
ते मर्मृजत ददृवांसो अद्रिं तदेषामन्ये अभितो वि वोचन्। पश्वयन्त्रासो अभि कारमर्चन्विदन्त ज्योतिश्चकृपन्त धीभिः ॥

ते। मर्मृजत। ददृऽवांसः। अद्रिम्। तत्। एषाम्। अन्ये। अभितः। वि। वोचन्। पश्वऽयन्त्रासः। अभि। कारम्। अर्चन्। विदन्त। ज्योतिः। चकृपन्त। धीभिः॥१४॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 14 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो हम लोगों के मनन करने और पालन करनेवाले (अद्रिम्) मेघ के (ददृवांसः) तोड़नेवाले किरणों के सदृश हम लोगों को (मर्मृजत) शुद्ध होकर शुद्ध करते हैं (एषाम्) इसके मध्य में (अन्ये) दूसरे लोग (तत्) इस कारण (अभितः) चारों ओर से सम्मुख (वि, वोचन्) उपदेश देते (पश्वयन्त्रासः) देखे हैं, यन्त्र जिन्होंने ऐसे होते हुए (कारम्) शिल्पकृत्य का (अभि, अर्चन्) सत्कार करते (धीभिः) बुद्धियों वा कर्मों से (ज्योतिः) प्रकाश को (विदन्त) जानने और सबों में (चकृपन्त) कृपालु होते हैं (ते) वे सब लोगों से सत्कार पाने योग्य होवें ॥१४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो वेद, उपवेद, अङ्ग और उपाङ्गों के पार जाने और शिल्पविद्या के जाननेवाले विद्वान् लोग कृपा से सब को उत्तम प्रकार शिक्षा का उपदेश करके विद्यायुक्त करें, वे सब लोगों से सत्कार करने योग्य होवें ॥१४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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