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Rigveda Mandal 4 / Sukta 1 / Mantra 13

58 Sukta
20 Mantra
4/1/13
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒स्माक॒मत्र॑ पि॒तरो॑ मनु॒ष्या॑ अ॒भि प्र से॑दुर्ऋ॒तमा॑शुषा॒णाः। अश्म॑व्रजाः सु॒दुघा॑ व॒व्रे अ॒न्तरुदु॒स्रा आ॑जन्नु॒षसो॑ हुवा॒नाः ॥१३॥

अ॒स्माक॑म् । अत्र॑ । पि॒तरः॑ । म॒नु॒ष्याः॑ । अ॒भि । प्र । से॒दुः॒ । ऋ॒तम् । आ॒शु॒षा॒णाः । अश्म॑ऽव्रजाः । सु॒ऽदुघा॑ । व॒व्रे । अ॒न्तः । उत् । उ॒स्राः । आ॒ज॒न् । उ॒षसः॑ । हु॒वा॒नाः ॥

Mantra without Swara
अस्माकमत्र पितरो मनुष्या अभि प्र सेदुर्ऋतमाशुषाणाः। अश्मव्रजाः सुदुघा वव्रे अन्तरुदुस्रा आजन्नुषसो हुवानाः ॥

अस्माकम्। अत्र। पितरः। मनुष्याः। अभि। प्र। सेदुः। ऋतम्। आशुषाणाः। अश्मऽव्रजाः। सुऽदुघाः। वव्रे। अन्तः। उत्। उस्राः। आजन्। उषसः। हुवानाः॥१३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 14 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (अत्र) इस संसार वा व्यवहार में (अस्माकम्) हम लोगों के (मनुष्याः) मनन करने और (पितरः) पालन करनेवाले (ऋतम्) सत्य को (आशुषाणाः) सब प्रकार प्राप्त हुए वा ब्रह्मचर्य से शुष्क शरीरवाले (अश्मव्रजाः) मेघों में चलनेवाले (सुदुघाः) उत्तम प्रकार कामनाओं के पूर्ण करनेवाले (उषसः) प्रातःकालों को (उस्राः) किरणों के सदृश (हुवानाः) पुकारनेवाले हुए (उत्, आजन्) प्राप्त होते हैं (अन्तः) मध्य में (अभि) सम्मुख (प्र, सेदुः) जाते हैं, उनको जो (वव्रे) ढाँपता है, वह भाग्यशाली होता है ॥१३॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो लोग आप लोगों के पालन करनेवाले ब्रह्मचर्य्य को धारण करके जैसे सूर्य की किरणें मेघों को वर्षाती हैं, वैसे ही बुलाये हुए सत्य का प्रकाश करते हैं, उनका जो सत्कार करता है, वह भाग्यशाली होता है ॥१३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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