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Rigveda Mandal 4 / Sukta 1 / Mantra 12

58 Sukta
20 Mantra
4/1/12
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र शर्ध॑ आर्त प्रथ॒मं वि॑प॒न्याँ ऋ॒तस्य॒ योना॑ वृष॒भस्य॑ नी॒ळे। स्पा॒र्हो युवा॑ वपु॒ष्यो॑ वि॒भावा॑ स॒प्त प्रि॒यासो॑ऽजनयन्त॒ वृष्णे॑ ॥१२॥

प्र । शर्धः॑ । आ॒र्त॒ । प्र॒थ॒मम् । वि॒ऽप॒न्या । ऋ॒तस्य॑ । योना॑ । वृ॒ष॒भस्य॑ । नी॒ळे । स्पा॒र्हः । युवा॑ । व॒पु॒ष्यः॑ । वि॒भाऽवा॑ । स॒प्त । प्रि॒यासः॑ । अ॒ज॒न॒य॒न्त॒ । वृष्णे॑ ॥

Mantra without Swara
प्र शर्ध आर्त प्रथमं विपन्याँ ऋतस्य योना वृषभस्य नीळे। स्पार्हो युवा वपुष्यो विभावा सप्त प्रियासोऽजनयन्त वृष्णे ॥

प्र। शर्धः। आर्त। प्रथमम्। विपन्या। ऋतस्य। योना। वृषभस्य। नीळे। स्पार्हः। युवा। वपुष्यः। विभाऽवा। सप्त। प्रियासः। अजनयन्त। वृष्णे॥१२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 14 Mantra » 2

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Meaning
हे विद्वन् पुरुष ! जैसे (वृष्णे) वृष्टि करनेवाले जीव के लिये (सप्त) पाँच प्राण मन और बुद्धि ये सात (प्रियासः) सुन्दर और सेवन करने योग्य (अजनयन्त) उत्पन्न करते हैं, वैसे (ऋतस्य) सत्यकारण के (योना) स्थान में (वृषभस्य) वृष्टि करनेवाले अग्नि के (नीळे) स्थान में (स्पार्हः) अभिलाषा करने योग्य (युवा) युवावस्था को प्राप्त (वपुष्यः) रूपों में श्रेष्ठ और (विभावा) अनेक प्रकार की विद्याओं के प्रकाशयुक्त हुए आप (विपन्या) अनेक प्रकार के व्यवहार में श्रेष्ठ प्रशंसा से (प्रथमम्) पहिले (शर्धः) बल को (प्र, आर्त्त) प्राप्त हूजिये ॥१२॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे प्राण और अन्तःकरण कार्य के साधक और प्रिय होते हैं, वैसे ही पुरुषार्थ से कार्य्य और कारण जानकर और परमेश्वर का ज्ञान करके प्रथम अवस्था में शरीर और आत्मा के बल को प्राप्त होकर सुखों को उत्पन्न करो ॥१२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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