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Rigveda Mandal 4 / Sukta 1 / Mantra 11

58 Sukta
20 Mantra
4/1/11
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स जा॑यत प्रथ॒मः प॒स्त्या॑सु म॒हो बु॒ध्ने रज॑सो अ॒स्य योनौ॑। अ॒पाद॑शी॒र्षा गु॒हमा॑नो॒ अन्ता॒योयु॑वानो वृष॒भस्य॑ नी॒ळे ॥११॥

सः । जा॒य॒त॒ । प्र॒थ॒मः । प॒स्त्या॑सु । म॒हः । बु॒ध्ने । रज॑सः । अ॒स्य । योनौ॑ । अ॒पात् । अ॒शी॒र्षा । गु॒हमा॑नः । अन्ता॑ । आ॒ऽयोयु॑वानः । वृ॒ष॒भस्य॑ । नी॒ळे ॥

Mantra without Swara
स जायत प्रथमः पस्त्यासु महो बुध्ने रजसो अस्य योनौ। अपादशीर्षा गुहमानो अन्तायोयुवानो वृषभस्य नीळे ॥

सः। जायत। प्रथमः। पस्त्यासु। महः। बुध्ने। रजसः। अस्य। योनौ। अपात्। अशीर्षा। गुहमानः। अन्ता। आऽयोयुवानः। वृषभस्य। नीळे॥११॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 14 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (सः) बिजुलीरूप अग्नि (प्रथमः) प्रथम सूर्य्य (महः) बड़े (बुध्ने) अन्तरिक्ष में (अस्य) इस (रजसः) लोकों के समूह के (योनौ) कारण में (जायत) उत्पन्न होता है और जैसे (गुहमानः) ढंपा हुआ (अपात्) पैरों और (अशीर्षा) शिर आदि (आयोयुवानः) सब प्रकार अत्यन्त मिलाने वा अलग करनेवाला (वृषभस्य) वृष्टि करनेवाले सूर्य्य के (नीळे) स्थान में (अन्ता) समीप में उत्पन्न होता है, वैसे ही आप लोग भी (पस्त्यासु) घरों में उत्पन्न अर्थात् प्रकट हूजिये ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे अन्तरहित आकाश में प्रकृति से महत् तत्त्व अर्थात् बुद्धि आदि के क्रम से यह संसार उत्पन्न हुआ इस संसार में अवयवों से रहित मिलते हुए जीव परमात्मा के समीप में वर्त्तमान हो, गृहों में उत्पन्न होते शरीर को धारण करते और त्यागते हैं, उस सब के स्वामी का हृदय में ध्यान कर सुखी हूजिये ॥११॥
Subject
अब इस अगले मन्त्र में अग्निपद से परमात्मा के विषय को कहते हैं ॥