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Rigveda Mandal 4 / Sukta 1 / Mantra 10

58 Sukta
20 Mantra
4/1/10
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स तू नो॑ अ॒ग्निर्न॑यतु प्रजा॒नन्नच्छा॒ रत्नं॑ दे॒वभ॑क्तं॒ यद॑स्य। धि॒या यद्विश्वे॑ अ॒मृता॒ अकृ॑ण्व॒न्द्यौष्पि॒ता ज॑नि॒ता स॒त्यमु॑क्षन् ॥१०॥

सः । तु । नः॒ । अ॒ग्निः । न॒य॒तु॒ । प्र॒ऽजा॒नन् । अच्छ॑ । रत्न॑म् । दे॒वऽभ॑क्तम् । यत् । अ॒स्य॒ । धि॒या । यत् । विश्वे॑ । अ॒मृताः॑ । अकृ॑ण्वन् । द्यौः । पि॒ता । ज॒नि॒ता । स॒त्यम् । उ॒क्ष॒न् ॥

Mantra without Swara
स तू नो अग्निर्नयतु प्रजानन्नच्छा रत्नं देवभक्तं यदस्य। धिया यद्विश्वे अमृता अकृण्वन्द्यौष्पिता जनिता सत्यमुक्षन् ॥

सः। तु। नः। अग्निः। नयतु। प्रजानन्। अच्छ। रत्नम्। देवऽभक्तम्। यत्। अस्य। धिया। यत्। विश्वे। अमृताः। अकृण्वन्। द्यौः। पिता। जनिता। सत्यम्। उक्षन्॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 13 Mantra » 5

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Meaning
हे राजन् ! जैसे (सः) वह (अस्य) इस संसार का (पिता) पालन करने और (जनिता) उत्पन्न करनेवाला (द्यौः) प्रकाशमान (अग्निः) अपने से प्रकाशरूप परमात्मा के सदृश राजा (धिया) बुद्धि से सब को (प्रजानन्) जानता हुआ (नः) हम लोगों को (यत्) जो (देवभक्तम्) देवों से सेवित (रत्नम्) सुन्दर धन को (अच्छ) उत्तम प्रकार प्राप्त कराता है, वैसे आप (नयतु) प्राप्त कराइये (यत्) जिसमें (तु) फिर (विश्वे) सब (अमृताः) जन्म और मृत्यु से रहित जीव (सत्यम्) सत्य का (उक्षन्) सेवन करते हुए मोक्ष को (अकृण्वन्) करते हैं, वहाँ ही स्थित हो और सत्य का सेवन और धर्म से राज्य का पालन करके मोक्ष को प्राप्त होइये ॥१०॥
Essence
हे राजा आदि मनुष्यों ! जैसे सब जगत् का पालन और उत्पन्न करनेवाला परमात्मा दया से सब जीवों के सुख के लिये अनेक प्रकार के पदार्थों को रच और दे के अभिमान नहीं करता है, वैसे ही आप लोग होइये और ईश्वर के उत्तम गुण, कर्म्म और स्वभावों के तुल्य अपने गुण, कर्म्म और स्वभावों को करके राज्य आदि का पालन करके अन्त में मोक्ष को प्राप्त होओ ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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