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Rigveda Mandal 3 / Sukta 9 / Mantra 8

62 Sukta
9 Mantra
3/9/8
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- विराड्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
आ जु॑होता स्वध्व॒रं शी॒रं पा॑व॒कशो॑चिषम्। आ॒शुं दू॒तम॑जि॒रं प्र॒त्नमीड्यं॑ श्रु॒ष्टी दे॒वं स॑पर्यत॥

आ । जु॒हो॒त॒ । सु॒ऽअ॒ध्व॒रम् । शी॒रम् । पा॒व॒कऽशो॑चिषम् । आ॒शुम् । दू॒तम् । अ॒जि॒रम् । प्र॒त्नम् । ईड्य॑म् । श्रु॒ष्टी । दे॒वम् । स॒प॒र्य॒त॒ ॥

Mantra without Swara
आ जुहोता स्वध्वरं शीरं पावकशोचिषम्। आशुं दूतमजिरं प्रत्नमीड्यं श्रुष्टी देवं सपर्यत॥

आ। जुहोत। सुऽअध्वरम्। शीरम्। पावकऽशोचिषम्। आशुम्। दूतम्। अजिरम्। प्रत्नम्। ईड्यम्। श्रुष्टी। देवम्। सपर्यत॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 6 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! तुम लोग जैसे (स्वध्वरम्) हिंसा न करने योग्य (शीरम्) विद्युत् रूप से सब जगह भरे हुए (पावकशोचिषम्) शुद्ध प्रकाशवाले (आशुम्) शीघ्रगामी (दूतम्) दूत के तुल्य देशान्तर में समाचार पहुँचानेवाले (अजिरम्) फेंकनेहारे (प्रत्नम्) प्राचीन (ईड्यम्) खोजने योग्य विद्युत् रूप अग्नि का (आ, जुहोत) अच्छे प्रकार ग्रहण करो वैसे ही स्वयंप्रकाशरूप सर्वत्र व्यापक (देवम्) उत्तम गुण-कर्म-स्वभावयुक्त सब आनन्द देनेवाले परमात्मा की (श्रुष्टी) शीघ्र (सपर्यत) सेवा करो ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो बिजुली के तुल्य व्यापक, स्वयंप्रकाशरूप, अविद्यादि दोषों का नाश करनेवाला, सनातन, अनादि काल से प्रशंसा करने योग्य परमात्मा है, उसीका नित्य ध्यान करो॥८॥
Subject
फिर ईश्वर का ही ध्यान करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।