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Rigveda Mandal 3 / Sukta 9 / Mantra 7

62 Sukta
9 Mantra
3/9/7
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
तद्भ॒द्रं तव॑ दं॒सना॒ पाका॑य चिच्छदयति। त्वां यद॑ग्ने प॒शवः॑ स॒मास॑ते॒ समि॑द्धमपिशर्व॒रे॥

तत् । भ॒द्रम् । तव॑ । दं॒सना॑ । पाका॑य । चि॒त् । छ॒द॒य॒ति॒ । त्वाम् । यत् । अ॒ग्ने॒ । प॒शवः॑ । स॒म्ऽआस॑ते । सम्ऽइ॑द्धम् । अ॒पि॒ऽश॒र्व॒रे ॥

Mantra without Swara
तद्भद्रं तव दंसना पाकाय चिच्छदयति। त्वां यदग्ने पशवः समासते समिद्धमपिशर्वरे॥

तत्। भद्रम्। तव। दंसना। पाकाय। चित्। छदयति। त्वाम्। यत्। अग्ने। पशवः। सम्ऽआसते। सम्ऽइद्धम्। अपिऽशर्वरे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 6 Mantra » 2

Bhashya

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वि ! (यत्) जो मनुष्य (अपिशर्वरे) निश्चित अन्धकाररूप रात्रि में भी (समिद्धम्) प्रज्वलित अग्नि के निकट जैसे (पशवः) गौ आदि पशु शीतनिवारणार्थ वैसे (त्वाम्) आपके निकट (समासते) बैठते हैं उनके (पाकाय) परिपक्व दृढ़ होने के लिये अग्नि के (चित्) तुल्य (तत्) उस (भद्रम्) कल्याणकारक बुद्धि से उत्पन्न ज्ञान को (तव) आपका (दंसना) दर्शन शास्त्र (छदयति) बढ़ाता है ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे वन में अग्नि के चारों ओर स्थित हुए पशु सिंह आदि से रक्षित होते हैं, वैसे ही विद्वानों के ज्ञान का आश्रय मनुष्यों की सब ओर के भय से रक्षा करता है ॥७॥
Subject
फिर मनुष्य कैसे सब भय से रहित होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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