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Rigveda Mandal 3 / Sukta 9 / Mantra 6

62 Sukta
9 Mantra
3/9/6
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
तं त्वा॒ मर्ता॑ अगृभ्णत दे॒वेभ्यो॑ हव्यवाहन। विश्वा॒न्यद्य॒ज्ञाँ अ॑भि॒पासि॑ मानुष॒ तव॒ क्रत्वा॑ यविष्ठ्य॥

तम् । त्वा॒ । मर्ताः॑ । अ॒गृ॒भ्ण॒त॒ । दे॒वेभ्यः॑ । ह॒व्य॒ऽवा॒ह॒न॒ । विश्वा॑न् । यत् । य॒ज्ञान् । अ॒भि॒ऽपासि॑ । मा॒नु॒ष॒ । तव॑ । क्रत्वा॑ । य॒वि॒ष्ठ्य॒ ॥

Mantra without Swara
तं त्वा मर्ता अगृभ्णत देवेभ्यो हव्यवाहन। विश्वान्यद्यज्ञाँ अभिपासि मानुष तव क्रत्वा यविष्ठ्य॥

तम्। त्वा। मर्ताः। अगृभ्णत। देवेभ्यः। हव्यऽवाहन। विश्वान्। यत्। यज्ञान्। अभिऽपासि। मानुष। तव। क्रत्वा। यविष्ठ्य॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 6 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मानुष) मननशील (हव्यवाहन) ग्रहण करने योग्य शास्त्रीय युक्ति-युक्त वचनों को प्राप्त करानेहारे (यविष्ठ्य) अत्यन्त ब्रह्मचर्य और विद्या के अभ्यास से युवावस्था को प्राप्त उपदेशक विद्वन् ! (यत्) जो आप (विश्वान्) समस्त (यज्ञान्) विद्यादि के प्रापक व्यवहारों की (अभि, पासि) सब ओर से रक्षा करते हैं उन (तव) आपकी (क्रत्वा) बुद्धि से (मर्त्ताः) मरण धर्मवाले मनुष्य (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये (तम्) उन (त्वा) आपको (अगृभ्णत) ग्रहण करें ॥६॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिसके उपदेश से बुद्धि को प्राप्त होकर समग्र सुखों को आप लोग प्राप्त होवें, उसका सब ओर से सत्कार करो ॥६॥
Subject
फिर उपदेशक विषय को अगले मन्त्र में कहा है।