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Rigveda Mandal 3 / Sukta 9 / Mantra 5

62 Sukta
9 Mantra
3/9/5
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
स॒सृ॒वांस॑मिव॒ त्मना॒ग्निमि॒त्था ति॒रोहि॑तम्। ऐनं॑ नयन्मात॒रिश्वा॑ परा॒वतो॑ दे॒वेभ्यो॑ मथि॒तं परि॑॥

स॒सृ॒वांस॑म्ऽइव । त्मना॑ । अ॒ग्निम् । इ॒त्था । ति॒रःऽहि॑तम् । आ । ए॒न॒म् । न॒य॒त् । मा॒त॒रिश्वा॑ । प॒रा॒ऽवतः॑ । दे॒वेभ्यः॑ । म॒थि॒तम् । परि॑ ॥

Mantra without Swara
ससृवांसमिव त्मनाग्निमित्था तिरोहितम्। ऐनं नयन्मातरिश्वा परावतो देवेभ्यो मथितं परि॥

ससृवांसम्ऽइव। त्मना। अग्निम्। इत्था। तिरःऽहितम्। आ। एनम्। नयत्। मातरिश्वा। पराऽवतः। देवेभ्यः। मथितम्। परि॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 5 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (मातरिश्वा) वायु (परावतः) दूर देश से (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये (मथितम्) मन्थन किये (तिरोहितम्) परिच्छिन्न (अग्निम्) अग्नि को (ससृवांसमिव) प्राप्त होते हुए मनुष्य के समान (परि, आ, नयत्) सब ओर से सब प्रकार प्राप्त कराता है (इत्था) इसप्रकार उस (एनम्) अग्नि को (त्मना) आत्मा से तुम लोग विशेष कर जानो ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो ! जैसे प्रयत्न के साथ मन्थन आदि से उत्पन्न हुए अग्नि को वायु बढ़ाता और दूर पहुँचाता है तथा अग्नि प्राप्त हुए पदार्थों को जलाता है और दूरस्थ पदार्थों को नहीं जलाता, इसी प्रकार ब्रह्मचर्य्य, विद्या, योगाभ्यास, धर्मानुष्ठान और सत्पुरुषों के सङ्ग से साक्षात् किया आत्मा और परमात्मा सब दोषों को जला के सुन्दर प्रकाशित ज्ञान को प्रगट करता है ॥५॥
Subject
फिर आत्मज्ञान विषय को अगले मन्त्र में कहा है।