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Rigveda Mandal 3 / Sukta 9 / Mantra 4

62 Sukta
9 Mantra
3/9/4
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
ई॒यि॒वांस॒मति॒ स्रिधः॒ शश्व॑ती॒रति॑ स॒श्चतः॑। अन्वी॑मविन्दन्निचि॒रासो॑ अ॒द्रुहो॒ऽप्सु सिं॒हमि॑व श्रि॒तम्॥

ई॒यि॒ऽवांस॑म् । अति॑ । स्रिधः॑ । शश्व॑तीः । अति॑ । स॒श्चतः॑ । अनु॑ । ई॒म् । अ॒वि॒न्द॒न् । नि॒ऽचि॒रासः॑ । अ॒द्रुहः॑ । अ॒प्ऽसु । सिं॒हम्ऽइ॑व । श्रि॒तम् ॥

Mantra without Swara
ईयिवांसमति स्रिधः शश्वतीरति सश्चतः। अन्वीमविन्दन्निचिरासो अद्रुहोऽप्सु सिंहमिव श्रितम्॥

ईयिऽवांसम्। अति। स्रिधः। शश्वतीः। अति। सश्चतः। अनु। ईम्। अविन्दन्। निऽचिरासः। अद्रुहः। अप्ऽसु। सिंहम्ऽइव। श्रितम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 5 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (अति, स्रिधः) अति सहनशील (शश्वतीः) सनातन (अति, सश्चतः) अत्यन्त आपस में मिले हुए (निचिरासः) निश्चय से प्राचीन (अद्रुहः) द्रोहरहित प्रजाजन (ईयिवांसम्) प्राप्त होते हुए (अप्सु) जलों में (श्रितम्) आश्रित (सिंहमिव) सिंह के तुल्य (ईम्, अनु, अविन्दन्) सब ओर से अनुकूल प्राप्त हों, उनको तुम लोग सुख भोगनेवाले जानो ॥४॥
Essence
जैसे सिंह को देख के हरिण आदि भाग जाते हैं, वैसे ही सुशिक्षायुक्त विद्वान् प्रजाजनों को देखकर पाखण्डी लोग नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं ॥४॥
Subject
फिर पाखण्डी लोग कैसे दूर होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।