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Rigveda Mandal 3 / Sukta 9 / Mantra 1

62 Sukta
9 Mantra
3/9/1
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
सखा॑यस्त्वा ववृमहे दे॒वं मर्ता॑स ऊ॒तये॑। अ॒पां नपा॑तं सु॒भगं॑ सु॒दीदि॑तिं सु॒प्रतू॑र्तिमने॒हस॑म्॥

सखा॑यः । त्वा॒ । व॒वृ॒म॒हे॒ । दे॒वम् । मर्ता॑सः । ऊ॒तये॑ । अ॒पाम् । नपा॑तम् । सु॒ऽभग॑म् । सु॒ऽदीदि॑तिम् । सु॒ऽप्रतू॑र्तिम् । अ॒ने॒हस॑म् ॥

Mantra without Swara
सखायस्त्वा ववृमहे देवं मर्तास ऊतये। अपां नपातं सुभगं सुदीदितिं सुप्रतूर्तिमनेहसम्॥

सखायः। त्वा। ववृमहे। देवम्। मर्तासः। ऊतये। अपाम्। नपातम्। सुऽभगम्। सुऽदीदितिम्। सुऽप्रतूर्तिम्। अनेहसम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 5 Mantra » 1

Bhashya

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Meaning
हे उपदेशक सज्जन ! (मर्त्तासः) मननशील (सखायः) मित्र हुए हम लोग (ऊतये) रक्षा आदि के लिये (अपाम्) प्राणों के बीच (नपातम्) आत्मभाव से नाशरहित (अनेहसम्) न मारनेहारे (सुप्रतूर्त्तिम्) सुन्दर शीघ्रतायुक्त (सुदीदितिम्) विद्या और विनय के प्रकाश से युक्त (सुभगम्) उत्तम ऐश्वर्य्यवाले (देवम्) विद्वान् (त्वा) आपको (ववृमहे) स्वीकार करें ॥१॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि विद्यादि सौभाग्य जानने के लिये मित्रभाव का आश्रय कर और आप्त सत्य वक्ता विद्वान् के शरण को प्राप्त हो के अहिंसाधर्म का संग्रह करें ॥१॥
Subject
अब नव ऋचावाले नवमें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को अहिंसा धर्म का ग्रहण करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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