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Rigveda Mandal 3 / Sukta 8 / Mantra 9

62 Sukta
11 Mantra
3/8/9
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
हं॒साइ॑व श्रेणि॒शो यता॑नाः शु॒क्रा वसा॑नाः॒ स्वर॑वो न॒ आगुः॑। उ॒न्नी॒यमा॑नाः क॒विभिः॑ पु॒रस्ता॑द्दे॒वा दे॒वाना॒मपि॑ यन्ति॒ पाथः॑॥

हं॒साःऽइ॑व । श्रे॒णि॒शः । यता॑नाः । शु॒क्राः । वसा॑नाः । स्वर॑वः । नः॒ । आ । अ॒गुः॒ । उ॒त्ऽनी॒यमा॑नाः । क॒विऽभिः॑ । पु॒रस्ता॑त् । दे॒वाः । दे॒वाना॑म् । अपि॑ । य॒न्ति॒ । पाथः॑ ॥

Mantra without Swara
हंसाइव श्रेणिशो यतानाः शुक्रा वसानाः स्वरवो न आगुः। उन्नीयमानाः कविभिः पुरस्ताद्देवा देवानामपि यन्ति पाथः॥

हंसाःऽइव। श्रेणिशः। यतानाः। शुक्राः। वसानाः। स्वरवः। नः। आ। अगुः। उत्ऽनीयमानाः। कविऽभिः। पुरस्तात्। देवाः। देवानाम्। अपि। यन्ति। पाथः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 4 Mantra » 4

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Meaning
जो (देवाः) उत्तम गुण-कर्म-स्वभाववाले पण्डित लोग (श्रेणिशः) पंक्ति बाँधे (यतानाः) यत्न करते और (शुक्राः) जलों को (वसानाः) आच्छादन करते हुए (स्वरवः) सुन्दर स्वरों का सेवन करनेहारे (हंसाइव) हंसों के तुल्य दर्शनीय (नः) हमको (उन्नीयमानाः) उत्तम गुणों को प्राप्त करते हुए (पुरस्तात्) पहिले से (कविभिः) बुद्धिमानों के साथ वर्त्तमान (देवानाम्) विद्वानों के (पाथः) मार्ग को (अपि, यन्ति) चलते हैं वे भी हमको (आ, अगुः) अच्छे प्रकार प्राप्त होते हैं ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो हंसों के तुल्य मिल के प्रयत्न से सबकी उन्नति कर अपने आप उन्नति को प्राप्त हुए आप्त सत्यवादियों के मार्ग में चल के पराक्रम बढ़ाते हैं, वे ही पूर्ण सुख को भोगते हैं ॥९॥
Subject
फिर कौन पूर्ण सुख को प्राप्त होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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