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Rigveda Mandal 3 / Sukta 8 / Mantra 2

62 Sukta
11 Mantra
3/8/2
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
समि॑द्धस्य॒ श्रय॑माणः पु॒रस्ता॒द्ब्रह्म॑ वन्वा॒नो अ॒जरं॑ सु॒वीर॑म्। आ॒रे अ॒स्मदम॑तिं॒ बाध॑मान॒ उच्छ्र॑यस्व मह॒ते सौभ॑गाय॥

सम्ऽइ॑द्धस्य । श्रय॑माणः । पु॒रस्ता॑त् । ब्रह्म॑ । व॒न्वा॒नः । अ॒जर॑म् । सु॒ऽवीर॑म् । आ॒रे । अ॒स्मत् । अम॑तिम् । बाध॑मानः । उत् । श्र॒य॒स्व॒ । म॒ह॒ते । सौभ॑गाय ॥

Mantra without Swara
समिद्धस्य श्रयमाणः पुरस्ताद्ब्रह्म वन्वानो अजरं सुवीरम्। आरे अस्मदमतिं बाधमान उच्छ्रयस्व महते सौभगाय॥

सम्ऽइद्धस्य। श्रयमाणः। पुरस्तात्। ब्रह्म। वन्वानः। अजरम्। सुऽवीरम्। आरे। अस्मत्। अमतिम्। बाधमानः। उत्। श्रयस्व। महते। सौभगाय॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 3 Mantra » 2

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Meaning
हे रश्मिरक्षक सूर्य के समान तेजस्वी विद्वन् ! आप (पुरस्तात्) पहिले से (समिद्धस्य) प्रदीप्त तेजस्वी विद्वान् का (श्रयमाणः) सेवन करते और (अजरम्) अक्षय (सुवीरम्) जिससे उत्तम वीर पुरुष हों ऐसे (ब्रह्म) बढ़े धन को (वन्वानः) सेवन करते हुए (अस्मत्) हमारे (आरे) समीप वा दूर में (अमतिम्) अधर्मयुक्त विरुद्ध बुद्धि को (बाधमानः) नष्ट करते हुए (महते) बड़े (सौभगाय) उत्तम ऐश्वर्य होने के लिये निरन्तर (उत्, श्रयस्व) अच्छे प्रकार सेवन करो ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में पूर्व मन्त्र से (वनस्पते) इस पद की अनुवृत्ति आती है। जो मनुष्य अच्छी शिक्षा से कुबुद्धि का निवारण करते और धनादि ऐश्वर्य के साथ सुशिक्षा, विद्या और धर्म का प्रचार करते हुए सबके कल्याण की इच्छा करें, वे सदैव कल्याणभागी होवें ॥२॥
Subject
अब कौन मनुष्य कल्याण को प्राप्त होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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