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Rigveda Mandal 3 / Sukta 8 / Mantra 1

62 Sukta
11 Mantra
3/8/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒ञ्जन्ति॒ त्वाम॑ध्व॒रे दे॑व॒यन्तो॒ वन॑स्पते॒ मधु॑ना॒ दैव्ये॑न। यदू॒र्ध्वस्तिष्ठा॒ द्रवि॑णे॒ह ध॑त्ता॒द्यद्वा॒ क्षयो॑ मा॒तुर॒स्या उ॒पस्थे॑॥

अ॒ञ्जन्ति॑ । त्वाम् । अ॒ध्व॒रे । दे॒व॒ऽयन्तः॑ । वन॑स्पते । मधु॑ना । दैव्ये॑न । यत् । ऊ॒र्ध्वः । ति॒ष्ठाः॑ । द्रवि॑ना । इ॒ह । ध॒त्ता॒त् । यत् । वा॒ । क्षयः॑ । मा॒तुः । अ॒स्याः । उ॒पऽस्थे॑ ॥

Mantra without Swara
अञ्जन्ति त्वामध्वरे देवयन्तो वनस्पते मधुना दैव्येन। यदूर्ध्वस्तिष्ठा द्रविणेह धत्ताद्यद्वा क्षयो मातुरस्या उपस्थे॥

अञ्जन्ति। त्वाम्। अध्वरे। देवऽयन्तः। वनस्पते। मधुना। दैव्येन। यत्। ऊर्ध्वः। तिष्ठाः। द्रविणा। इह। धत्तात्। यत्। वा। क्षयः। मातुः। अस्याः। उपऽस्थे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 3 Mantra » 1

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Meaning
हे (वनस्पते) किरणों के रक्षक सूर्य्य के समान वर्त्तमान तेजस्वी विद्वन् ! (मधुना) (दैव्येन) विद्वानों में हुए कोमल स्वभाव के साथ वर्त्तमान (देवयन्तः) कामना करते हुए विद्वान् (यत्) जिन (त्वाम्) आपको (अध्वरे) पढ़ने-पढ़ाने और राज्य पालनादि व्यवहार में (अञ्जन्ति) चाहते हैं, सो आप जिनके बीच (ऊर्ध्वः) श्रेष्ठ गुणों से बढ़े हुए (तिष्ठाः) स्थित हूजिये (वा) और (इह) इस संसार में (द्रविणा) धनों को (धत्तात्) धारण करो (अस्याः) इस (मातुः) मान देनेवाली भूमि के (उपस्थे) समीप गोद में (यत्) जो (क्षयः) निवास्थान है, उसको हम लोग ग्रहण करें ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्राणी दिन को चाहते हैं, वैसे ही उत्तम विद्वान् लोगों को सब मनुष्य चाहें। सब मिल के प्रीति से उत्तम घर और ऐश्वर्य्य की सिद्धि करें ॥१॥
Subject
अब तीसरे मण्डल के आठवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य लोग किसकी कामना करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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