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Rigveda Mandal 3 / Sukta 7 / Mantra 9

62 Sukta
11 Mantra
3/7/9
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वृ॒षा॒यन्ते॑ म॒हे अत्या॑य पू॒र्वीर्वृष्णे॑ चि॒त्राय॑ र॒श्मयः॑ सुया॒माः। देव॑ होतर्म॒न्द्रत॑रश्चिकि॒त्वान्म॒हो दे॒वान्रोद॑सी॒ एह व॑क्षि॥

वृ॒षा॒ऽयन्ते॑ । म॒हे । अत्या॑य । पू॒र्वीः । वृष्णे॑ । चि॒त्राय॑ । र॒श्मयः॑ । सु॒ऽया॒माः । देव॑ । हो॒तः॒ । म॒न्द्रऽत॑रः । चि॒कि॒त्वान् । म॒हः । दे॒वान् । रोद॑सी॒ इति॑ । आ । इ॒ह । व॒क्षि॒ ॥

Mantra without Swara
वृषायन्ते महे अत्याय पूर्वीर्वृष्णे चित्राय रश्मयः सुयामाः। देव होतर्मन्द्रतरश्चिकित्वान्महो देवान्रोदसी एह वक्षि॥

वृषाऽयन्ते। महे। अत्याय। पूर्वीः। वृष्णे। चित्राय। रश्मयः। सुऽयामाः। देव। होतः। मन्द्रऽतरः। चिकित्वान्। महः। देवान्। रोदसी इति। आ। इह। वक्षि॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 2 Mantra » 4

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Meaning
हे (देव) प्रकाशमान (होतः) सबके लिये सुख देनेहारे विद्वान् (मन्द्रतरः) अतिआनन्दकारक (चिकित्वान्) चितानेहारे ! आप जैसे (सुयामाः) सुन्दर प्रहर आदि समयवाली (रश्मयः) किरणें (महे) बड़े (अत्याय) सब विद्याओं में व्यापनशील (चित्राय) आश्चर्य स्वभाववाले (वृष्णे) विद्या के प्रचारक विद्वान् के अर्थ (पूर्वीः) पहिले से वर्त्तमान प्रजाजनों को (वृषायन्ते) बैल के समान उत्साहित करती (रोदसी) सूर्य भूमि प्रकट करती हैं वैसे (इह) इस जगत् में (महः) महान् (देवान्) विद्वानों को (आ, वक्षि) अच्छे प्रकार प्राप्त कराइये ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य की किरणें प्रकाश से वृष्टि द्वारा सब प्रजा को सुखी करती हैं, वैसे ही विद्वान् लोग सब प्रजा जनों को विद्वान् कर सुन्दर ज्ञानयुक्त करते हैं ॥९॥
Subject
फिर विद्वान् लोग क्या करते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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