Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 3 / Sukta 7 / Mantra 4

62 Sukta
11 Mantra
3/7/4
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
महि॑ त्वा॒ष्ट्रमू॒र्जय॑न्तीरजु॒र्यं स्त॑भू॒यमा॑नं व॒हतो॑ वहन्ति। व्यङ्गे॑भिर्दिद्युता॒नः स॒धस्थ॒ एका॑मिव॒ रोद॑सी॒ आ वि॑वेश॥

महि॑ । त्वा॒ष्ट्रम् । ऊ॒र्जय॑न्तीः । अ॒जु॒र्यम् । स्त॒भु॒ऽयमा॑नम् । व॒हतः॑ । व॒ह॒न्ति॒ । वि । अङ्गे॑भिः । दि॒द्यु॒ता॒नः । स॒धऽस्थे॑ । एका॑म्ऽइव । रोद॑सी॒ इति॑ । आ । वि॒वे॒श॒ ॥

Mantra without Swara
महि त्वाष्ट्रमूर्जयन्तीरजुर्यं स्तभूयमानं वहतो वहन्ति। व्यङ्गेभिर्दिद्युतानः सधस्थ एकामिव रोदसी आ विवेश॥

महि। त्वाष्ट्रम्। ऊर्जयन्तीः। अजुर्यम्। स्तभुऽयमानम्। वहतः। वहन्ति। वि। अङ्गेभिः। दिद्युतानः। सधऽस्थे। एकाम्ऽइव। रोदसी इति। आ। विवेश॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 1 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जिस सूर्य के (अजुर्यम्) जीर्ण अवस्था से रहित (महि) बड़े (स्तभूयमानम्) लोकों के धारक (त्वाष्ट्रम्) तेज को (ऊर्जयन्तीः) बल देती हुई शक्तियों को यथा स्थान (वहतः) पहुँचानेवाले किरण (व्यङ्गेभिः) विविध प्रकार के अङ्गों से (वहन्ति) पहुँचाते हैं। जो (दिद्युतानः) देदीप्यमान हुआ अग्नि जैसे पति (सधस्थे) एक स्थान में (एकामिव) एक अपनी स्त्री का संग करता है वैसे (रोदसी) आकाश भूमि को (आ, विवेश) आवेश करता है उस विद्युत् रूप अग्नि को कार्य्यसिद्धि के लिये संप्रयुक्त करो ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि सर्वत्र अभिव्याप्त विद्युत् स्वरूप अग्नि के गुण, कर्म, स्वभावों को जानके कार्य्यसिद्धि करें ॥४॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।