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Rigveda Mandal 3 / Sukta 7 / Mantra 2

62 Sukta
11 Mantra
3/7/2
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दि॒वक्ष॑सो धे॒नवो॒ वृष्णो॒ अश्वा॑ दे॒वीरा त॑स्थौ॒ मधु॑म॒द्वह॑न्तीः। ऋ॒तस्य॑ त्वा॒ सद॑सि क्षेम॒यन्तं॒ पर्येका॑ चरति वर्त॒निं गौः॥

दि॒वक्ष॑सः । धे॒नवः॑ । वृष्णः॑ । अश्वाः॑ । दे॒वीः । आ । त॒स्थौ॒ । मधु॑ऽमत् । वह॑न्तीः । ऋ॒तस्य॑ । त्वा॒ । सद॑सि । क्षे॒म॒ऽयन्त॑म् । परि॑ । एका॑ । च॒र॒ति॒ । व॒र्त॒निम् । गौः ॥

Mantra without Swara
दिवक्षसो धेनवो वृष्णो अश्वा देवीरा तस्थौ मधुमद्वहन्तीः। ऋतस्य त्वा सदसि क्षेमयन्तं पर्येका चरति वर्तनिं गौः॥

दिवक्षसः। धेनवः। वृष्णः। अश्वाः। देवीः। आ। तस्थौ। मधुऽमत्। वहन्तीः। ऋतस्य। त्वा। सदसि। क्षेमऽयन्तम्। परि। एका। चरति। वर्तनिम्। गौः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 1 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् पुरुष ! जो (ऋतस्य) सत्य की (सदसि) सभा में (दिवक्षसः) प्रकाश को प्राप्त हो व्याप्त हुई (वृष्णः) बलिष्ठ पुरुष के (अश्वाः) शीघ्रगामी घोड़ों के समान (देवीः) दिव्यस्वरूप (मधुमत्) कोमल विज्ञानवाले उस सुख को (वहन्तीः) प्राप्त कराती हुई (धेनवः) वाणी (क्षेमयन्तम्) रक्षा करते हुए (त्वा) आप को (एका) एक (गौः) अपनी कक्षा में चलनेवाली भूमि (वर्त्तनिम्) मार्ग को (परि, चरति) सब ओर से चलती हुई सी (आ, तस्थौ) स्थित होती उन वाणियों को आप यथावत् जानो ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे असहाय पृथिवी अपने कक्षा मार्ग में नित्य चलती है, वैसे ही सभ्यजनों की वाणी नियम से मिथ्याभाषण को छोड़ सत्य मार्ग में चलती हैं। जो ऐसी वाणी का सेवन करते हैं, उनकी कुछ भी हानि नहीं होती ॥२॥
Subject
मनुष्यों को कैसी वाणी का सेवन करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।