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Rigveda Mandal 3 / Sukta 7 / Mantra 10

62 Sukta
11 Mantra
3/7/10
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पृ॒क्षप्र॑यजो द्रविणः सु॒वाचः॑ सुके॒तव॑ उ॒षसो॑ रे॒वदू॑षुः। उ॒तो चि॑दग्ने महि॒ना पृ॑थि॒व्याः कृ॒तं चि॒देनः॒ सं म॒हे द॑शस्य॥

पृ॒क्षऽप्र॑यजः । द्र॒वि॒णः॒ । सु॒ऽवाचः॑ । सु॒ऽके॒तवः॑ । उ॒षसः॑ । रे॒वत् । ऊ॒षुः॒ । उ॒तो इति॑ । चि॒त् । अ॒ग्ने॒ । म॒हि॒ना । पृ॒थि॒व्याः । कृ॒तम् । चि॒त् । एनः॑ । सम् । म॒हे । द॒श॒स्य॒ ॥

Mantra without Swara
पृक्षप्रयजो द्रविणः सुवाचः सुकेतव उषसो रेवदूषुः। उतो चिदग्ने महिना पृथिव्याः कृतं चिदेनः सं महे दशस्य॥

पृक्षऽप्रयजः। द्रविणः। सुऽवाचः। सुऽकेतवः। उषसः। रेवत्। ऊषुः। उतो इति। चित्। अग्ने। महिना। पृथिव्याः। कृतम्। चित्। एनः। सम्। महे। दशस्य॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 2 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वान् ! (द्रविणः) प्रशस्त द्रव्य जिसके विद्यमान ऐसे आप (महिना) महिमा से (महे) बड़े सौभाग्य के लिये (पृक्षप्रयजः) शुभ गुण और कोमल भाव से यज्ञ करनेहारे (उषसः) प्रभातवेला के तुल्य वर्तमान (सुवाचः) सुन्दर सत्य वाणी से युक्त (सुकेतवः) सुन्दर बुद्धिवाले (रेवत्) द्रव्य के समान (ऊषुः) वसें (उतो) और अन्धकार को निवृत्त करते हैं वैसे (पृथिव्याः) भूमि के मध्य में (कृतम्) किया हुआ (एनः) पाप (चित्) शीघ्र आप (सम्, दशस्य) सम्यक् नष्ट करो (चित्) और सुन्दर कर्म को प्राप्त करो ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो ! तुम लोग प्रभातवेला के तुल्य मनुष्यों के आत्माओं को प्रकाशित कर विज्ञान दे और अधर्माचरण को छुड़ा के सब मनुष्यों को सत्यवादी विद्वान् करो, जिससे पृथिवी पर पापाचरण न बढ़े ॥१०॥
Subject
फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।