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Rigveda Mandal 3 / Sukta 7 / Mantra 1

62 Sukta
11 Mantra
3/7/1
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र य आ॒रुः शि॑तिपृ॒ष्ठस्य॑ धा॒सेरा मा॒तरा॑ विविशुः स॒प्त वाणीः॑। प॒रि॒क्षिता॑ पि॒तरा॒ सं च॑रेते॒ प्र स॑र्स्राते दी॒र्घमायुः॑ प्र॒यक्षे॑॥

प्र । ये । आ॒रुः । शि॒ति॒ऽपृ॒ष्ठस्य॑ । धा॒सेः । आ । मा॒तरा॑ । वि॒वि॒शुः॒ । स॒प्त । वाणीः॑ । प॒रि॒ऽक्षिताः॑ । पि॒तरा॑ । सम् । च॒रे॒ते॒ । प्र । स॒र्स्रा॒ते॒ इति॑ । दी॒र्घम् । आयुः॑ । प्र॒ऽयक्षे॑ ॥

Mantra without Swara
प्र य आरुः शितिपृष्ठस्य धासेरा मातरा विविशुः सप्त वाणीः। परिक्षिता पितरा सं चरेते प्र सर्स्राते दीर्घमायुः प्रयक्षे॥

प्र। ये। आरुः। शितिऽपृष्ठस्य। धासेः। आ। मातरा। विविशुः। सप्त। वाणीः। परिऽक्षिताः। पितरा। सम्। चरेते। प्र। सर्स्राते इति। दीर्घम्। आयुः। प्रऽयक्षे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 1 Varga » 1 Mantra » 1

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Meaning
(ये) जो लोग (शितिपृष्ठस्य) जिसका पूँछना सूक्ष्म है (धासेः) उस धारण करनेवाले विद्युत् अग्नि के सम्बन्धी (परिक्षिता) सब ओर से निवास करते हुए (पितरा) पालक (मातरा) जल और अग्नि को (प्र, आरुः) प्राप्त होवें। जो जल अग्नि दोनों को (सम्, चरेते) सम्यक् विचरते हैं तथा (प्र, सर्स्राते) विस्तारपूर्वक प्राप्त होते हैं वे (दीर्घम्, आयुः) बड़ी अवस्था को और (प्रयक्षे) अच्छे प्रकार यज्ञ करने के लिये (सप्त, वाणीः) सात द्वारों में फैली वाणियों को (आ, विविशुः) प्रवेश करें सब प्रकार जानें ॥१॥
Essence
जो शरीर में विद्युत् रूप अग्नि फैला न हो, तो वाणी कुछ भी न चले। उस विद्युत् अग्नि का जो ब्रह्मचर्यादि उत्तम कर्मों में यथावत् सेवन करते हैं, वे बड़ी अवस्था को प्राप्त होते हैं ॥१॥
Subject
अब तीसरे अष्टक का आरम्भ है। उसके प्रथम अध्याय के पहिले सूक्त के प्रथम मन्त्र में विद्युत् अग्नि के गुणों का वर्णन किया है।

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