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Rigveda Mandal 3 / Sukta 62 / Mantra 17

62 Sukta
18 Mantra
3/62/17
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- विश्वामित्रो जमदग्निर्वा Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒रु॒शंसा॑ नमो॒वृधा॑ म॒ह्ना दक्ष॑स्य राजथः। द्राघि॑ष्ठाभिः शुचिव्रता॥

उ॒रु॒ऽशंसा॑ । न॒मः॒ऽवृधा॑ । म॒ह्ना । दक्ष॑स्य । रा॒ज॒थः॒ । द्राघि॑ष्ठाभिः । शु॒चि॒ऽव्र॒ता॒ ॥

Mantra without Swara
उरुशंसा नमोवृधा मह्ना दक्षस्य राजथः। द्राघिष्ठाभिः शुचिव्रता॥

उरुऽशंसा। नमःऽवृधा। मह्ना। दक्षस्य। राजथः। द्राघिष्ठाभिः। शुचिऽव्रता॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 11 Mantra » 7

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Meaning
हे (शुचिव्रता) उत्तमकर्म करनेवाले (उरुशंसा) बहुत स्तुतियों से युक्त (नमोवृधा) अन्न आदि के बढ़ानेवाले अध्यापक और उपदेशक लोगो ! जिससे कि आप दोनों प्राण और उदान वायु के सदृश (दक्षस्य) बल के (मह्ना) महत्त्व से (द्राघिष्ठाभिः) बहुत बड़ी और पुरुषार्थ से युक्त क्रियाओं से (राजथः) प्रकाशित होते हैं, इस कारण सत्कार करने योग्य हैं ॥१७॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो पवित्रता से युक्त यशस्वी जन बल ऐश्वर्य्य और अन्न आदि की वृद्धि और बड़े श्रेष्ठ कर्म्मों से लोकों में प्रकाशित होते हैं, उनकी ही सेवा और सत्कार करो ॥१७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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