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Rigveda Mandal 3 / Sukta 62 / Mantra 11

62 Sukta
18 Mantra
3/62/11
Devata- सविता Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
दे॒वस्य॑ सवि॒तुर्व॒यं वा॑ज॒यन्तः॒ पुर॑न्ध्या। भग॑स्य रा॒तिमी॑महे॥

दे॒वस्य॑ । स॒वि॒तुः । व॒यम् । वा॒ज॒ऽयन्तः॑ । पुर॑म्ऽध्या । भग॑स्य । रा॒तिम् । ई॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
देवस्य सवितुर्वयं वाजयन्तः पुरन्ध्या। भगस्य रातिमीमहे॥

देवस्य। सवितुः। वयम्। वाजऽयन्तः। पुरम्ऽध्या। भगस्य। रातिम्। ईमहे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 11 Mantra » 1

Bhashya

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (पुरन्ध्या) जिस बुद्धि से बहुत बोधों को धारण करता उससे (वाजयन्तः) जनाते हुए (वयम्) हम लोग (सवितुः) प्रेरणा करनेवाले अन्तर्य्यामी (देवस्य) कामना करने के योग्य (भगस्य) ऐश्वर्य्य देनेवाले के (रातिम्) दान की (ईमहे) याचना करते हैं, वैसे आप लोग भी उस बुद्धि की याचना करो ॥११॥
Essence
मनुष्य लोग जो बुद्धि को बढ़ाय पुरुषार्थ से धर्म का अनुष्ठान कर और परमेश्वर की आज्ञा के अनुकूल वर्त्ताव करके अपनी शुद्धि के लिये प्रार्थना करैं तो ईश्वर उनको शीघ्र पवित्र और शुद्ध आचरणयुक्त करता है ॥११॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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