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Rigveda Mandal 3 / Sukta 61 / Mantra 5

62 Sukta
7 Mantra
3/61/5
Devata- उषाः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अच्छा॑ वो दे॒वीमु॒षसं॑ विभा॒तीं प्र वो॑ भरध्वं॒ नम॑सा सुवृ॒क्तिम्। ऊ॒र्ध्वं म॑धु॒धा दि॒वि पाजो॑ अश्रे॒त्प्र रो॑च॒ना रु॑रुचे र॒ण्वसं॑दृक्॥

अच्छ॑ । वः॒ । दे॒वीम् । उ॒षस॑म् । वि॒ऽभा॒तीम् । प्र । वः॒ । भ॒र॒ध्व॒म् । नम॑सा । सु॒ऽवृ॒क्तिम् । ऊ॒र्ध्वम् । म॒धु॒धा । दि॒वि । पाजः॑ । अ॒श्रे॒त् । प्र । रो॒च॒ना । रु॒रु॒चे॒ । र॒ण्वऽस॑न्दृक् ॥

Mantra without Swara
अच्छा वो देवीमुषसं विभातीं प्र वो भरध्वं नमसा सुवृक्तिम्। ऊर्ध्वं मधुधा दिवि पाजो अश्रेत्प्र रोचना रुरुचे रण्वसंदृक्॥

अच्छ। वः। देवीम्। उषसम्। विऽभातीम्। प्र। वः। भरध्वम्। नमसा। सुऽवृक्तिम्। ऊर्ध्वम्। मधुधा। दिवि। पाजः। अश्रेत्। प्र। रोचना। रुरुचे। रण्वऽसन्दृक्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 8 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (रण्वसन्दृक्) सुन्दर पदार्थों के दिखाने (रोचना) रुचि करने और (मधुधा) मधुर पदार्थों को धारण करनेवाली (दिवि) प्रकाश में (वः) आप लोगों को (प्र, रुरुचे) अच्छी लगती है और जिससे (वः) आप लोगों के (ऊर्ध्वम्) उत्तम (पाजः) बल का (अश्रेत्) श्रवण करती है, उस (देवीम्) प्रकाशमान और आप लोगों और (विभातीम्) अनेक पदार्थों को प्रकाशित करती हुई (सुवृक्तिम्) उत्तम प्रकार वर्त्तमान (उषसम्) प्रभातवेला को (नमसा) वज्र अर्थात् बिजुली के साथ आप लोग (अच्छ) उत्तम प्रकार (प्र, भरध्वम्) पुष्ट कीजिये ॥५॥
Essence
जैसे प्रातःकाल को सेवन करते हुए लोग उत्तम बल को प्राप्त होते हैं, वैसे ही स्नेहपात्र पतिव्रता स्त्री को प्राप्त होकर पुरुष शरीर आत्मबल और आरोग्यपन को प्राप्त होते हैं, जिससे दोनों के सदृश होने पर प्रेम बढ़ै ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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