Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 3 / Sukta 61 / Mantra 4

62 Sukta
7 Mantra
3/61/4
Devata- उषाः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अव॒ स्यूमे॑व चिन्व॒ती म॒घोन्यु॒षा या॑ति॒ स्वस॑रस्य॒ पत्नी॑। स्व१॒॑र्जन॑न्ती सु॒भगा॑ सु॒दंसा॒ आन्ता॑द्दि॒वः प॑प्रथ॒ आ पृ॑थि॒व्याः॥

अव॑ । स्यूम॑ऽइव । चि॒न्व॒ती । म॒घोनी॑ । उ॒षा । या॑आ॒इ॒ । स्वस॑रस्य । पत्नी॑ । स्वः॑ । जन॑न्ती । सु॒ऽभगा॑ । सु॒ऽदंसाः॑ । आ । अन्ता॑त् । दि॒वः । प॒प्र॒थे॒ । आ । पृ॒थि॒व्याः ॥

Mantra without Swara
अव स्यूमेव चिन्वती मघोन्युषा याति स्वसरस्य पत्नी। स्व१र्जनन्ती सुभगा सुदंसा आन्ताद्दिवः पप्रथ आ पृथिव्याः॥

अव। स्यूमऽइव। चिन्वती। मघोनी। उषा। याति। स्वसरस्य। पत्नी। स्वः। जनन्ती। सुऽभगा। सुऽदंसाः। आ। अन्तात्। दिवः। पप्रथे। आ। पृथिव्याः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 8 Mantra » 4

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे स्त्रियो ! जो (स्यूमेव) डोरों के सदृश व्याप्त (चिन्वती) बटोरती हुई (मघोनी) अत्यन्त धन से युक्त (स्वसरस्य) दिन की (पत्नी) स्त्री के सदृश वर्त्तमान (स्वः, जनन्ती) सूर्य्य वा सुख को उत्पन्न करती हुई (सुभगा) सौभाग्य की करनेवाली (सुदंसाः) उत्तमकर्म जिसमें विद्यमान ऐसी (उषाः) प्रातःकाल की वेला (आ, अन्तात्) सब प्रकार समीप से (दिवः) प्रकाशमान सूर्य्य और (आ) सब प्रकार समीप (पृथिव्याः) पृथिवी के योग से (पप्रथे) प्रख्यात होती है (अव, याति) और प्राप्त होती है, वैसे ही आप लोग भी वर्त्ताव करो ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे स्त्रियो ! जैसे दिन का सम्बन्धी प्रातःकाल है, वैसे ही छाया के सदृश अपने-अपने पति के साथ अनुकूल होकर वर्त्ताव करो और जैसे यह प्रकाश पृथिवी के योग से होता है, वैसे पति और पत्नी के सम्बन्ध से सन्तान होते हैं ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.