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Rigveda Mandal 3 / Sukta 61 / Mantra 2

62 Sukta
7 Mantra
3/61/2
Devata- उषाः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उषो॑ दे॒व्यम॑र्त्या॒ वि भा॑हि च॒न्द्रर॑था सू॒नृता॑ ई॒रय॑न्ती। आ त्वा॑ वहन्तु सु॒यमा॑सो॒ अश्वा॒ हिर॑ण्यवर्णां पृथु॒पाज॑सो॒ ये॥

उषः॑ । दे॒वि॒ । अम॑र्त्या । वि । भा॒हि॒ । च॒न्द्रऽर॑था । सू॒नृताः॑ । ई॒रय॑न्ती । आ । त्वा॒ । व॒ह॒न्तु॒ । सु॒ऽयमा॑सः । अश्वाः॑ । हिर॑ण्यऽवर्णाम् । पृ॒थु॒ऽपाज॑सः । ये ॥

Mantra without Swara
उषो देव्यमर्त्या वि भाहि चन्द्ररथा सूनृता ईरयन्ती। आ त्वा वहन्तु सुयमासो अश्वा हिरण्यवर्णां पृथुपाजसो ये॥

उषः। देवि। अमर्त्या। वि। भाहि। चन्द्रऽरथा। सूनृताः। ईरयन्ती। आ। त्वा। वहन्तु। सुऽयमासः। अश्वाः। हिरण्यऽवर्णाम्। पृथुऽपाजसः। ये॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 8 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (देवि) उत्तम प्रकार शोभित (उषः) प्रातःवेला के सदृश वर्त्तमान (सूनृताः) उत्तम प्रकार सत्य क्रियाओं की (ईरयन्ती) प्रेरणा करती हुई (चन्द्ररथा) चन्द्रमा के सदृश रथ जिसका ऐसी (अमर्त्या) मरण धर्म से रहित हुई (वि, भाहि) शोभित होओ और (ये) जो (पृथुपाजसः) बहुत बलयुक्त (सुयमासः) उत्तम प्रकार नियम करनेवाले (हिरण्यवर्णाम्) तेजोमयी कान्ति को (अश्वाः) व्याप्त किरणों के सदृश (त्वा) आपको (आ, वहन्तु) प्राप्त हों उनको सुखपूर्वक आप शोभित करिये ॥२॥
Essence
जैसे चन्द्रमारूप रथवाली प्रातःकाल की वेला तेजस्स्वरूप होकर सबको जगाती है, वैसे ही उत्तम पण्डिता स्त्रियाँ अपने अपने पति को सेवा और विनय से सुशील करती हैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को प्रकारान्तर से अगले मन्त्र में कहते हैं।