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Rigveda Mandal 3 / Sukta 60 / Mantra 5

62 Sukta
7 Mantra
3/60/5
Devata- ऋभवः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
इन्द्र॑ ऋ॒भुभि॒र्वाज॑वद्भिः॒ समु॑क्षितं सु॒तं सोम॒मा वृ॑षस्वा॒ गभ॑स्त्योः। धि॒येषि॒तो म॑घवन्दा॒शुषो॑ गृ॒हे सौ॑धन्व॒नेभिः॑ स॒ह म॑त्स्वा॒ नृभिः॑॥

इन्द्र॑ । ऋ॒भुऽभिः॑ । वाज॑वत्ऽभिः । सम्ऽउ॑क्षितम् । सु॒तम् । सोम॑म् । आ । वृ॒ष॒स्व॒ । गभ॑स्त्योः । धि॒या । इ॒षि॒तः । म॒घ॒व॒न् । दा॒शुषः॑ । गृ॒हे । सौ॒ध॒न्व॒नेभिः॑ । स॒ह । म॒त्स्व॒ । नृऽभिः॑ ॥

Mantra without Swara
इन्द्र ऋभुभिर्वाजवद्भिः समुक्षितं सुतं सोममा वृषस्वा गभस्त्योः। धियेषितो मघवन्दाशुषो गृहे सौधन्वनेभिः सह मत्स्वा नृभिः॥

इन्द्र। ऋभुऽभिः। वाजवत्ऽभिः। सम्ऽउक्षितम्। सुतम्। सोमम्। आ। वृषस्व। गभस्त्योः। धिया। इषितः। मघवन्। दाशुषः। गृहे। सौधन्वनेभिः। सह। मत्स्व। नृऽभिः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 7 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) प्रंशसितधनयुक्त (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्यवाले ! (धिया) बुद्धि से (इषितः) प्रेरित आप (वाजवद्भिः) प्रशंसनीय अन्न आदि ऐश्वर्यों से युक्त (ऋभुभिः) बुद्धिमानों के साथ (समुक्षितम्) उत्तम प्रकार सींचे (सुतम्) उत्पन्न किये गये (सोमम्) ऐश्वर्य को (गभस्त्योः) हाथों के बल से (आ, वृषस्व) सब प्रकार पुष्टिये, (सौधन्वनेभिः) बुद्धिमानों के पुत्रों और (नृभिः) विद्या आदि व्यवहारों में अग्रगन्ता जनों के (सह) साथ (दाशुषः) देनेवाले के (गृहे) घर में (मत्स्व) आनन्दित हूजिये ॥५॥
Essence
राजा को चाहिये कि बुद्धिमान् जनों के सहित प्रजाओं की रक्षा और न्याय से ऐश्वर्य की वृद्धि करके तथा राज्य के कर देनेवालों को आनन्दित करके नायकों के साथ प्रजाओं को सदैव आनन्दित करैं ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।