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Rigveda Mandal 3 / Sukta 6 / Mantra 7

62 Sukta
11 Mantra
3/6/7
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दि॒वश्चि॒दा ते॑ रुचयन्त रो॒का उ॒षो वि॑भा॒तीरनु॑ भासि पू॒र्वीः। अ॒पो यद॑ग्न उ॒शध॒ग्वने॑षु॒ होतु॑र्म॒न्द्रस्य॑ प॒नय॑न्त दे॒वाः॥

दि॒वः । चि॒त् । आ । ते॒ । रु॒च॒य॒न्त॒ । रो॒काः । उ॒षः । वि॒ऽभा॒तीः । अनु॑ । भा॒सि॒ । पू॒र्वीः । अ॒पः । यत् । अ॒ग्ने॒ । उ॒शध॑क् । वने॑षु । होतुः॑ । म॒न्द्रस्य॑ । प॒नय॑न्त । दे॒वाः ॥

Mantra without Swara
दिवश्चिदा ते रुचयन्त रोका उषो विभातीरनु भासि पूर्वीः। अपो यदग्न उशधग्वनेषु होतुर्मन्द्रस्य पनयन्त देवाः॥

दिवः। चित्। आ। ते। रुचयन्त। रोकाः। उषः। विऽभातीः। अनु। भासि। पूर्वीः। अपः। यत्। अग्ने। उशधक्। वनेषु। होतुः। मन्द्रस्य। पनयन्त। देवाः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 27 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वान् ! (दिवः) प्रकाश से लेकर (चित्) ही (ते) आपके (रोकाः) रुचि करनेवाले प्रकाश (आ, रुचयन्त) अच्छे प्रकार रुचते हैं जैसे सूर्य (पूर्वीः) प्राचीन (विभातीः) और विशेषता से प्रकाश होती हुई (उषः) प्रभातवेलाओं को प्रकाशित करता वा (अपः) जलों को वर्षाता है (यत्) जो आप विद्या के (अनुभासि) अनुकूलता से प्रकाशित होते हो उन (मन्द्रस्य) आनन्द देनेवाले (होतुः) दानशील (तव) आपके गुणों के जैसे (वनेषु) जंगलों में (उशधक्) मनोहर पदार्थों को जिससे जलाता वह अग्नि वर्त्तमान है वैसे (देवाः) विद्वान् जन (पनयन्त) प्रशंसित करो ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य के समान प्रकाश कराने, दुष्टों को जलाने और श्रेष्ठों की स्तुति प्रशंसा करनेवाले होते हैं, वे बिजुली के समान कार्य के सिद्ध करनेवाले होते हैं ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।